सुख के लिए

"जिस सुख के लिए,
जीवन में साथी-
रहता बेचैन।
स्वयं कर लेता,
निश्चित सुख की-
सीमा रेखा।
उसे पाने को ही,
हर पल-
स्वयं को छलता।
अपने-अपनों को भी,
स्वार्थ में -
देता धोखा।
झूठ-फरेब सब कुछ,
अपना कर भी-
पाना चाहता सुख।
-लेकिन,
मिलता नहीं सुख,
मृगतृष्णा बन-
तरसाता रहता।
सब कुछ पाने की,
चाहत में-
उसे दौड़ता।
अपनों से लड़ता,
सपने दिखाता-
जीवन में।
सुख के लिए फिर भी,
जीवन में साथी-
रहता हर पल बेचैन।।"

रचयिता
अनुपम राजवंशी,
सहसमन्वयक,
विकास क्षेत्र-हापुड़,
जनपद-हापुड़।

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