गाँव

भारत की आत्मा जहाँ बसती है
     जाति-धर्म के बन्धन से मुक्त
खुली धुप स्वच्छ हवा का आंनद
         सादगीपूर्वक जीवन।
वह है अपना  गाँव।।

         जहाँ मनुष्यता जीवित है
सदियों की परम्पराएँ विद्यमान
    पुत्र-पुत्री में मात-पिता ने रग-रग में भरा संस्कार
भारतीय संस्कृति का दर्शन कराता।
   वह है अपना गाँव।।

कृषि व्यवस्था का आधार
      उत्सव मेलों की भरमार
सभ्यता संस्कृति समेटे
      सुख दुःख में सहयोग अपार।
वह है अपना गाँव।।

लहलहाते हरे-भरे खेत
           गोधूलि बेला होते                       
खेत खलिहान से लौटता किसान
       बाग़ बग़ीचे का सौंदर्य
धरती जहाँ सोना उगलें।
    वह है अपना गाँव।।

आँगन से उठती धुँए की सोंधी सुगन्ध..
   मैदान में गिल्ली डण्डा खेलता बचपन..
  सिर पर घड़े भरकर पानी लाती अम्मा..
   लालटेन की रोशनी में बच्चों को सुलाती दादी माँ।
     वह है अपना गाँव।।

हृदय द्रवित हो रहा है
      विकास की अंधी दौड़ में
कुँए के पानी का मिठास खो रहा
   भाई-भाई का प्रेम
देवर-भाभी का परिहास खो रहा
     जाड़े में दालान में पड़े पुवाल का आनंद खो रहा
    मन्दिर की घण्टी मस्जिद का अज़ान खो रहा
     दादा की गोदी नानी की लोरी बेमिसाल खो रहा
   गाँव क्यों अपना अस्तित्व
महक अपनी पहचान खो रहा।।

रचयिता
रवीन्द्र नाथ यादव,
सहायक अध्यापक,  
प्राथमिक विद्यालय कोडार उर्फ़ बघोर नवीन,
विकास क्षेत्र-गोला,
जनपद-गोरखपुर।

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