सुहाग

भरती हैं सिंदूर की लंबी माँग
जीवन साथी ही उसका भाग।
करें वटसावित्री, करवा चौथ
व्रत ताकि  दीर्घायु रहें सुहाग।।

जीवन महकता रहे दिलबाग
खुशियों के  संग हो  हर राग।
वह चलती हर पथ संग-संग
समझकर वह अपना सुभाग।।

सतीरुप में ग्रहण करती आग
सुहाग के लिए कर देती त्याग।
यमराज से भी वापस ले आती
अपने तपबल पर अपना सुहाग।।

नारी का एक उजाला है सुहाग
चाहें गोरा हो  या काला सुहाग।
माँगें यही  आशीष माँ गोरा से
हर जन्म में रहे मेरा अटल सुहाग।।

रचयिता
गोपाल कौशल
नागदा जिला धार मध्यप्रदेश
99814-67300
रोज एक - नई कविता 
Email ID : gopalkaushal917@gmail.com
©स्वरचित ® 26-10-2017

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