87/2025, बाल कहानी- 15 मई


बाल कहानी - संवेदना
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रात के करीब एक बजे का समय रहा होगा। ट्रेन के एसी कोच में सफर का आनन्द लेती परिणीति अपनी सीट पर बैठकर खिड़की से चाँद को बड़े प्यार से निहार रही थी। न जाने वह जीवन के किस उधेड़बुन में बस चाँद को एक-टक निहारे जा रही थी। तभी परिणीति का ध्यान उचटा, उसके ठीक सामने की सीट पर सोई हुई कोई साठ-सत्तर वर्षीय महिला सोते समय कुछ बुदबुदा रही थी। शायद वह कोई नाम ले रही थी और वह बुदबुदाहट धीरे-धीरे तेज आवाज में परिवर्तित होने लगी। परिणीति कुछ समझ पाये, तब तक ठीक ऊपर वाली सीट पर सोये हुए उनके पति ने उन्हें हिलाया और चुप होने को कहा। वह महिला चुपचाप सो गई। परिणीति की आँखें भारी होने लगी और उसकी आँखें अभी झपी ही थी, कि सामने वाली महिला नींद में 'सुमेश..सुमेश आ जाओ.. आ जाओ।' फिर बोलने लगी। परिणीति उनका चेहरा फिर देखने लगी। अजनबी होने के कारण उसने उससे कुछ कहा नहीं, पर वह सोच-सोच के हैरान हो रही थी कि यह किसको इतना याद कर रही हैं? इतने पर फिर उनके पति ने उन्हें झकझोरा और शान्त होने को कहा। यह सिलसिला रात में तीन से चार बार चला। परिणीति बहुत देर तक इस महिला के बारे में सोचती रही कि यह किसको इतना याद कर रही है? पता नहीं, कब परिणीति की आँख लग गई। 
सुबह हुई, चाय-चाय की आवाज से परिणीति की आँखें खुली। सामने की सीट पर बैठे हुए बुजुर्ग दम्पत्ति चाय और बिस्कुट का आनन्द ले रहे थे। परिणीति ने मुस्कुराकर सुबह का अभिवादन किया, "गुड मॉर्निंग!" वह दोनों भी मुस्कुरा कर बोले, "गुड मॉर्निंग बेटा!"
थोड़ी देर की बातचीत के बाद जब परिणीति बुजुर्ग दम्पत्ति से सहज हुई, तब उसने पूछा, "आन्टी! आप रात में बार-बार सुमेश-सुमेश कहके किसे याद कर रही थी?" तब वह बोली, "बेटा! सुमेश मेरा बेटा है। मेरे दो बेटे हैं और वह दोनों ही अमेरिका में एक बड़ी कम्पनी में जॉब करते हैं।"
यह बात उन्होंने परिणीति को बड़े गर्व के साथ बतायी। वह अपने बेटे-बहुओं व पोता-पोती के बारे में चर्चा करती रही। परन्तु बहुत जल्द बात करते-करते उनके अन्दर का दर्द बातों में झलकने लगा। उनके मुख से निकला, "काश! मेरी एक बेटी होती..।" 
तब तक परिणीति का स्टेशन आ चुका था। उसने अपना सामान उठाया और सामने बैठे हुए दम्पत्ति को अभिवादन कर कहा, "नमस्ते! आन्टी.. नमस्ते अंकल जी!" बुजुर्ग दम्पत्ति ने उन्हें आशीर्वाद दिया। कहकर वह ट्रेन से नीचे उतर गयी। स्टेशन से बाहर निकाल कर वह अपने घर के लिए ऑटो में बैठ गयी। परन्तु परिणीति के मन में अभी भी उन्हीं आन्टी जी की बात गूँज रही थी कि, "काश! मेरी एक बेटी होती..।" परणीति सोच रही थी, "शायद, वह अपने बेटों से अपनी भावनाएँ नहीं कह पाती होगी या फिर उनके बच्चों को अपने जीवन की व्यस्तता में बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी का एहसास ही नहीं होता होगा। वह अपने जीवन की आपाधापी और पैसे के पीछे दौड़ में इतना व्यस्त होंगे कि माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्य शायद भूल ही गए।" यही सब सोचते-सोचते ही परिणीति अपने घर पहुँच गयी।
"जिनका मोल जीवन में उन्होंने सबसे ज्यादा रखा, उन्हीं के जीवन में कोई स्थान, उन्हें कहाँ रखा?"

#संस्कार_सन्देश - 
हमें अपने जीवन में जिम्मेदारियों का निर्वहन करते-करते यह नहीं भूलना चाहिए कि बुढ़ापे में माता-पिता के प्रति भी हमारे कुछ कर्तव्य होते हैं। उन्हें उम्र के इस पड़ाव पर हमारी बहुत जरूरत होती है।

कहानीकार-
#रचना_तिवारी (अध्यापिका )
प्रा० वि० ढिमरपुरा, पुनावली कलां,
ब्लाक- बबीना, जिला- झाँसी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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