82/2025, बाल कहानी- 08 मई


बाल कहानी - संगति
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सोहनलाल के तीन बेटे और एक बेटी थी। यह चारों गाँव में ही प्राइमरी विद्यालय में पढ़ते थे। सोहनलाल सब्जी बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। सोनू, मोनू, बंटी और पूजा इन बच्चों के नाम थे। बंटी और पूजा पढ़ाई में बहुत होशियार थे लेकिन सोनू, मोनू बहुत शरारती थे। वे विद्यालय पहुँचकर बस्ता रखकर किसी न किसी बहाने से गायब हो जाते और छुट्टी के समय आ जाते थे। 
एक दिन मास्टर जी उपस्थिति लेने के लिए कक्षा में आये। सोनू, मोनू का कहीं भी पता नहीं था। पूछने पर बच्चों ने बताया कि, "सरजी! यह रोज बाहर चले जाते हैं।" सरजी ने उन पर निगरानी रखना शुरू कर दिया। एक दिन सोनू, मोनू ने बहाना लगाया कि, "सरजी! मेरे पेट में दर्द हो रहा है, मुझे शौच हेतु जाना है।" सरजी ने कहा, "झूठ तो नहीं बोल रहे हो?" 
"नहीं, सच्ची..।" उन्होंने कहा। "लेकिन सरजी! मोनू भी मेरे साथ जायेगा क्योंकि मुझे खेत में डर लगता है।" सरजी को तो निगरानी रखनी थी कि यह करते क्या है? उन्होंने कहा, "जल्दी जाओ और जल्दी आना!" 
"ठीक है सरजी!" ऐसा कहकर वे निकल गये। विद्यालय से सरजी और कुछ बच्चे उनका पीछा करने लगे। चलते-चलते वे एक खेत में घूसे, जहाँ पर भूत की बुज्जी बँधी हुई थी। उसके अन्दर कुछ लड़कों की आवाजें आ रही थी। सोनू, मोनू उसमें घुस गये। जब सरजी पीछे से पहुँचे, तब उन्होंने देखा तो वह आश्चर्यचकित हो गए। वहाँ पर चार-पाँच लड़के बैठे हुए थे और जुआ खेल रहे थे, बीड़ी पी रहे थे। इन दोनों के हाथ में बीड़ी थी। तब मास्टर जी ने इन सभी को पकड़कर गाँव में ले आये और सभी गाँव वालों को बुलाया। 
यह सिलसिला काफी दिनों से चल रहा था। सभी के माता-पिता यह देखकर बड़े दु:खी हुए कि हम तो इन्हें विद्यालय भेजते हैं। 
सोहनलाल ने जब अपने बेटों को देखा तो उसने कहा, "सरजी! हम सवेरे निकल जाते हैं इन बच्चों की खातिर।" सरजी ने कहा, "सोहनलाल! तुम्हारा कोई कसूर नहीं है। यह जो बिगड़े हुए बच्चे हैं, यह नहीं चाहते कि तुम्हारे बच्चे भी पढ़-लिखकर बड़े आदमी बनें। हमें अपने बच्चों की परवरिश करने के लिए पता लगाना पड़ता है कि यह बच्चे किसके साथ खेलते हैं, उठते-बैठते हैं।" 
उन चारों बच्चों के माता-पिता भी बड़े दु:खी हुए। सबको पकड़ने के लिए पुलिस बुला ली गयी। तब यह सारे बच्चे रोने लगे और कहने लगे कि, "आज के बाद हम कभी भी इन चीजों को हाथ नहीं लगायेंगे, लेकिन हमारी गलती नहीं है। हमारे घर के पीछे रामदीन काका ने हमको यह आदत डलवाई थी।" 
रामदीन काका सभी गाँव वालों से जलते थे। जब पुलिस रामदीन को पड़कर लायी, तब रामदीन ने कहा, "मैं अपनी पुरानी दुश्मनी का बदला ले रहा हूँ। इन गाँव वालों ने मुझे बहुत परेशान किया था, इसलिए मैंने उनके बच्चों को बिगाड़ने की कोशिश की।" तब सभी गाँव वालों ने राम दिन को खूब मारा और कहा, "तुम तब भी गलत थे और आज भी गलत हो क्योंकि तुम्हारी संगति तुम्हारी परवरिश हमेशा बुरी संगति में हुई है और तुम हमेशा बुरे ही रहोगे लेकिन तुम्हारी वजह से हम अपने बच्चों की संगति को बिगड़ने नहीं देंगे।" उन्होंने रामदीन काका को पुलिस के हवाले कर दिया और सभी ने सरजी की प्रशंसा की कि, "आज आपकी वजह से हमारी आँखें खुल गयीं। आपने बच्चों को बिगड़ने से बचा लिया।" सरजी ने कहा, "कोई बात नहीं है, यह विद्यालय मेरा अपना परिवार है। इस परिवार के सारे बच्चे मेरे अपने हैं और इन पर ध्यान देना भी मेरा काम है। आप लोग मेहनत मजदूरी करते हैं। इन बच्चों की खातिर। हम इन बच्चों को उचित शिक्षा देने के लिए आते हैं।" सभी बच्चों ने सरजी माफी माँगी और कहा कि, "हम विद्यालय में आयेंगे तो विद्यालय समय के बाद ही जायेंगे और पढ़कर दिखायेंगे।" यह सुनकर सभी बहुत खुश हुए।

#संस्कार_सन्देश -
हमें अपने बच्चों की उचित परवरिश के साथ-साथ बच्चों के दोस्तों पर भी ध्यान रखना चाहिए, ताकि वे बुरी संगत में न फँसें। 

कहानीकार-
#पुष्पा_शर्मा (शि०मि०)
पी० एस० राजीपुर, 
अकराबाद, अलीगढ़ (उ०प्र०)

 ✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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