86/2025, बाल कहानी- 14 मई


बाल कहानी- मैं भी पढ़ूॅंगी
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राजू और मुनिया हमेशा की तरह स्कूल से वापस घर को लौट रहे थे। रास्ते-भर छोटी-छोटी शरारतें करते वह दोनों घर आकर दादी से लिपट गए। दादी ने हमेशा की तरह दोनों को प्यार किया, फिर भोजन का आग्रह किया। राजू की माँ ने दोनों के लिए खाना परोसा। खाने में खीर भी थी, जो मुनिया को बहुत पसन्द थी। अचानक खाते-खाते मुनिया उदास हो गई। दादी बड़े ध्यान से उसके चेहरे पर उतार-चढ़ाव को देख रही थी। राजू से रहा न गया। उसने पूछा, "अरे मुनिया! स्कूल में किसी ने कुछ कहा क्या?.. बुआ की याद आ रही है क्या? (मुनिया राजू की बुआ की लड़की है) मुनिया और उदास हो गई। दादी ने राजू को इशारे से कुछ भी बोलने को मना कर दिया। बात आयी-गयी हो गई। 
दूसरे दिन से गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो रही थी। मुनिया को अपने घर वापस जाना था। रात में जब राजू ने दादी से कहानी सुनाने की जिद की तो दादी ने कहा, "आज मैं तुम्हें एक बहादुर लड़की की असली कहानी सुनाती हूँ। दूर गाँव के एक परिवार में एक बच्ची का जन्म हुआ। उसके पैदा होने पर परिवार में उसकी माता के अतिरिक्त कोई प्रसन्न नहीं हुआ, क्योंकि वह सब पुत्र की इच्छा रखते थे। बच्ची बहुत प्यारी थी। धीरे-धीरे वह बड़ी होने लगी। उसने अपने रूप और स्वभाव से सब का मन मोह लिया। माँ उसे घर के छोटे-मोटे काम सिखाने लगी। बच्ची उन कामों को करके बहुत खुश होती थी। धीरे-धीरे वह माँ के काम में हाथ बँटाने लगी। इसी बीच परिवार में दूसरे बच्चे का जन्म हुआ। परिवार में बहुत खुशियाँ मनाई गईं। इसी बीच बच्ची ने एक दिन माँ से कहा, "माँ! पड़ोस की रीता, सीमा, कीर्ति आदि स्कूल जाने लगी हैं। माँ! मुझे कब स्कूल भेजोगी?" माँ के कुछ बोलने से पहले दादी बोल पड़ी, "अरे! अभी तो तेरे भाई का भी काम बढ़ गया। तू घर के काम और भाई की देख-भाल कर, कुछ दिनों तक तेरी माँ बाहर खेतों में काम करेगी। ऐसी दशा में तू स्कूल जायेगी तो घर के काम कौन करेगा?.. तेरे भाई को कौन सँभालेगा?" नन्ही बालिका अवाक रह गई। माँ ने प्यार से बात सँभालते हुए कहा कि, "अभी तेरा भाई बहुत छोटा है, जब बड़ा हो जाएगा, तब देखेंगे।" देखते-देखते भाई भी स्कूल जाने लगा और नन्हीं बालिका ने घर के लगभग सारे काम सँभाल लिये। घर में बुहारी लगाना, जानवरों को पानी पिलाना, चूल्हा जलाकर रोटी बनाना, पर नन्हें हृदय ने हार न मानी। 
एक दिन सुबह-सुबह नहा-धोकर बच्ची माँ के सामने खड़ी हुई और बहुत दुलार से पूछा, "माँ! अब तो मुझे भी स्कूल भेजो, मैं नन्हे भाई की उँगली पड़कर उसी के साथ स्कूल चली जाऊँगी।" 
"अरे!" दादी ने उसे जोर से झिड़का, "तू लड़कों की बराबरी करेगी? तुझे स्कूल नहीं जाना है! यह सपना देखना बन्द कर दे। आखिर घर के काम कौन करेगा?" बच्ची ने हार नहीं मानी। उसने कहा, "दादी! मैं घर के काम के लिए भी समय निकाल लूँगी और स्कूल के लिए भी, लेकिन मैं स्कूल जरूर जाऊँगी।" माँ ने असहाय होकर बच्ची की तरफ देखा और कहा, "बेटी! जिद छोड़ दे और जाकर भाई को स्कूल के लिए तैयार कर!" तब-तक पास के गाँव से उस बच्ची की नानी अपनी बेटी का हाल-चाल पूछने आ गयी। जब उन्हें पूरी बात पता चली तो उन्होंने अपनी बेटी के घर वालों को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने सरकारी स्कूल में मिलने वाली सुविधाओं का भी जिक्र किया, पर वह लोग नहीं माने। हारकर नानी वापस जाने लगी, तब बालिका ने आकर अपनी नानी का पल्लू पकड़ लिया और दृढ़ता से कहा, "मैं पढ़ना चाहती हूँ। नानी! मुझे अपने साथ ले चलो!" राजू खुशी से उछला, "बड़ी बहादुर थी वह लड़की पर नानी...?" आगे की बात राजू की दादी समझ गई, "अरे पगले! वह लड़की ही तो मुनिया है तेरी बुआ की लड़की।" 
"अरे वाह मुनिया!" राजू बहन से लिपट गया। फिर बोला, "कल जब तुम घर जाना तो बताना कि स्कूल में तुमने क्या-क्या सीखा और..और तुम क्लास में हमेशा प्रथम आती हो। तुम किसी लड़के से किसी प्रकार कम नहीं हो।" 
"हाँ राजू!" मुनिया शरमाई, तब-तक दादी ने बच्चों को सोने के लिए आग्रह किया और दोनों सोने चले गये। 

#संस्कार_सन्देश -
विचारों की दृढ़ता भाग्य बदलने की क्षमता रखती है।

कहानीकार-
डॉ० #सीमा_द्विवेदी(स०अ०) 
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली 
जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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