80/2025, बाल कहानी- 06 मई


बाल कहानी - मेले की सैर
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एक गाँव में रमा अपने छोटे भाई के साथ रहती थी। रमा के माता-पिता बचपन में ही एक दुर्घटना में परलोक सिधार गये थे। रमा के चाचा-चाची ने ही रमा और उसके भाई की परवरिश की और उन्हें पढ़ाया-लिखाया।
अब रमा पन्द्रह वर्ष की हो चुकी थी। उसका छोटा भाई राहुल भी दस वर्ष का था। वह कक्षा पाँच की परीक्षा पास कर छठवीं में पहुँच गया था। रमा इस वर्ष दसवीं में टाॅप करके ग्यारहवीं में आ चुकी थी। रमा और राहुल दोनों पढ़ाई में बहुत ही होशियार थे। रमा अपनी पढ़ाई करने के साथ-साथ अपने भाई राहुल को भी घर पर सुबह-शाम पढ़ाया करती थी।
एक बार रमा के मामा-मामी रमा और राहुल को लेने आये और बोले कि, "हमारे गाँव में मेला लगा है। चलो, तुम्हें दिखा लाते हैं।" यह सुनकर रमा और उसका भाई बहन खुश हुए। दोनों मामा-मामी के साथ उनके गाँव चले गये।
कुछ दिन मेला देखने के बाद रमा ने अपने घर जाना चाहा तो मामी ने कहा कि, "कुछ दिन और रुको!"
रमा बोली, "नहीं मामी! इतने दिनों तक स्कूल न जाने के कारण मेरी ओर राहुल की बहुत पढ़ाई पिछड़ गयी है। उसे भी पूरा करना होगा। आगे फिर जब कभी समय मिलेगा, फिर आ जायेंगे।"
मामी ने पूछा, "यहाँ का मेला तुम्हें कैसा लगा रमा?"
रमा मुस्कराकर बोली, "मामी! मेले में हम दोनों को बहुत मजा आया। हमने बहुत आनन्द लिया। मेले में तरह-तरह की दुकानें थीं। मैने मेले से चाची के लिए रसोईघर की वस्तुएँ, राहुल के लिए खिलौने और अपने लिए कुछ धार्मिक और व्रत-उपवास की किताबें खरीदी हैं। मैंने अपने और राहुल के लिए जूते-चप्पल और मोजे भी खरीदे हैं तथा कुछ कपड़े भी लिए हैं।"
"और खाया क्या है?"
"अरे मामी! खाने की तो कुछ पूछो ही मत! जलेबी, रसगुल्ले, समोसा, बर्फी, चाट-टिकियों और तले चनों का आनन्द लिया। यहाँ बहुत ही सुन्दर और आकर्षक मन्दिर हैं देवी का। यज्ञ के साथ-साथ मेले का आयोजन बहुत सुन्दर लगा। मेले में हमने रामलीला और नटों के खेल भी देखे। मुझे तो जो चाहिए था, सब-कुछ मिला मामी!"
यह सुनकर मामी बहुत खुश हुई और बोली, "अब तुम दोनों हर साल यहाँ आया करो। यहाँ आस-पास के सभी गाँवों से बहुत संख्या में लोग परिवार समेत आते हैं।" रमा ने हामी भरी और बोली, ये नटखट राहुल बहुत परेशान करता है। बार-बार दूर छिटक जाता था। इसे दो-तीन बार ढूँढ़ना पड़ता था कि कहीं खो न जाये।"
"क्यों राहुल? ऐसा नहीं करते! अगर मेले में खो जाते तो कैसे मिलते? अगर ऐसा करोगे तो अगले वर्ष फिर तुम्हें नहीं बुलायेंगे।" मामी की बात सुनकर राहुल बोला, "प्लीज मामी! अब मैं ऐसा नहीं करुँगा। मैं इतना छोटा थोड़े ही हूँ कि खो जाऊँ।"
यह सुनकर रमा और मामी हँसने लगे। राहुल बोला, "अगली साल तक तो मैं और बड़ा हो जाऊँगा।" दोनों फिर हँसने लगे। रमा बोली, हाँ.हाँ क्यों नहीं, लेकिन फिर भी सावधानी बहुत जरुरी है।" राहुल बोला, "ठीक है, अब मैं ऐसा नहीं करुँगा, मैंने कह तो दिया है।"
मामी बोली, "बस करो रमा! इसे अब मत सताओ! अब यह ऐसा नहीं करेगा।"
"ठीक है मामी!" रमा ने कहा।
अगले दिन वे दोनों अपने मामा के साथ अपने घर आ गये और वहाँ का सारा वृतान्त अपने चाचा-चाची को सुनाया और मेले में खरीदी गई सभी चीजें उन्हें दिखायीं। देखकर चाचा-चाची बहुत खुश हुए। मामा चाय-नाश्ता करके उन सबसे विदा लेकर अपने गाँव की ओर चल दिए। 

संस्कार सन्देश-
मेला हमें बहुत कुछ सिखा और दे जाता है, फिर भी ऐसी भीड़-भाड़ में सावधानी भी बहुत जरुरी है।

कहानीकार-
प्राची कुशवाहा (कक्षा- 5)
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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