पर्यावरण दिवस

सन-सन चलती पवन मन रंगाइत है,

फूलों के परिमल से मन गंधताइत है।


मन की उमंगें उफनाती सी लग रहीं,

चंचल तरंगें बलखाती लग रही हैं।


फलने सी लगी है अन्तर की कामना,

जगने सी लगी है मेरी सृजन कामना।।


पनघट, पनिहारियों की गीतों से गुँजित है,

अधरों पर जीवन का प्रणय राग संचित है।


नर्तन सा करने लगीं संचित आशायें,

कुसमित प्रफुल्लित हैं सारी अभिलाषाएँ।


आओ! मिल करें प्रेम आराधना,

जगने सी लगी है मेरी सृजन कामना।।


रचयिता
डॉ0 प्रवीणा दीक्षित,
हिन्दी शिक्षिका,
के.जी.बी.वी. नगर क्षेत्र,
जनपद-कासगंज।


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