पवन

मन मयूरा नाच उठे,

जब चले पवन पुरवइया।

इठलाती बलखाती ऐसे,

जैसे नाव खेवे खिवइया।।


गालों से आलिंगन करती,

जब यह तन को छू जाए।

हो एहसास प्राकृत सौंदर्य का,

और उर आनंद समाए।।


चिड़िया चीं-चीं कर देखो,

कैसे शोर मचाए।

पिहू-पिहू बोले पपीहा,

कोयल गीत सुनाए।।


पवन के देखो रूप अनेक,

बिजली भी इससे बन जाए‌।

खेतों में देखो किसान,

इससे गेहूँ धान ओसाए।।


रौद्र रूप यह दिखलाए,

जब तीव्र वेग अपनाए।

हौले-हौले चले पवन जब,

मन को शांत कर जाए।।


रचयिता

ज्योति विश्वकर्मा,

सहायक अध्यापिका,

पूर्व माध्यमिक विद्यालय जारी भाग 1,

विकास क्षेत्र-बड़ोखर खुर्द,

जनपद-बाँदा।




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