शिक्षक दिवस

मैं शिक्षक समाज का दर्पण हूँ, 

गढ़-गढ़ कर नींव बनाता हूँ|

कोरी किताब के पन्नों पर, 

संस्कारों की फसल उगाता हूँ||


हर एक को ये सौभाग्य नहीं, 

नन्हें भविष्य को रचने का|

हम शिक्षक हैं आदर्श रचें, 

झूठे आडम्बर से बचने का||


एक बीज लगाया धरती पर, 

ममता के रस से सींचा है

उद्दण्ड हुये जो संगति से, 

कानों को भी फिर खींचा है||


दोहरे दायित्व निभाते हैं, 

पर तनिक नहीं घबराते हैं|

बच्चों की हँसी के खातिर हम, 

कितने अवॉर्ड जाते हैं||


समता सम्बन्धों की जननी, 

हर द्वेष द्वन्द्व धो डालेंगे,

नव भारत रचने खातिर, 

तन मन अर्पण कर डालेंगे||


राधाकृष्णन के आदर्शों को, 

मिटने न दें हम धरती पर|

एक जीवन क्या सौ-सौ अर्पण, 

इस मानवता की परती पर||


मन की ज्योति आलौकिक हो, 

तम मिटे ज्योत से ज्योत जले|

शिक्षक का सब सम्मान करें, 

शिक्षक के आदर्शो पर चलें


रचयिता

रीता गुप्ता,

सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कलेक्टर पुरवा,
विकास खण्ड-महुआ,
जनपद-बाँदा।

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