163/2026, बाल कहानी- 16 सितम्बर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 163/2026
*16 सितम्बर 2026 (बुधवार)*
#बाल_कहानी - #तीज_और_जंगल_की_पाठशाला
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हमीरपुर जनपद के एक छोटे से घर में गुड़िया अपनी माँ के साथ रहती थी। भादों का महीना था। घर में आज कुछ अलग था। माँ ने सुबह से कुछ नहीं खाया था, मेहंदी लगायी थी। सारा घर फूलों से सजा था। गुड़िया दौड़ती हुई आयी और बोली, "माँ! आज सब आंटियाँ हरी-हरी साड़ी पहनकर क्यों आयी है? और आपने आज लड्डू भी नहीं खाया?" माँ ने उसे गोद में बिठाया और बोली, "आज हरितालिका तीज है बेटा! आज मैं तुझे एक राजकुमारी और उसकी सहेलियों की कहानी सुनाऊँगी। सुनोगी?" गुड़िया झट से स्वीकृति में सिर हिलाकर नीचे बैठ गई।
माँ बोली, "हिमालय के बीच एक बहुत सुन्दर राज्य था। वहाँ की राजकुमारी थीं पार्वती। पार्वती दूसरी राजकुमारियों जैसी नहीं थी। उसे सोने-चाँदी के हार से ज्यादा किताबें, जंगल और पहाड़ों पर बैठकर ध्यान लगाना पसन्द था। वे चाहती थी कि वह सबसे होशियार और ज्ञानी बने, जैसे शिव जी।
एक दिन उसके पिता जी हिमालय राज ने कहा, "पार्वती! अब तुम्हारी शादी का समय आ गया है। मैंने तुम्हारे लिए एक बहुत बड़े राजा को चुना है।"
ये सुनकर पार्वती बहुत उदास हो गई। वह उस राजा से शादी नहीं करना चाहती थी। वह तो अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी। वह रोने लगी। उसकी सबसे प्यारी सहेली, जिसका नाम हरिता था, दौड़ती हुई आयी। उसने पूछा, "क्या हुआ पार्वती? तुम रो क्यों रही हो?" पार्वती ने सब बताया। हरिता ने कहा, "तुम चिन्ता मत करो, हम हैं ना!" हरिता तुरन्त अपनी बाकी सहेलियों मालती, जूही और चम्पा को बुला लाई। सबने मिलकर एक गुप्त योजना बनाई। रात को जब सब सो गए, सारी सहेलियाँ चुपके से आयीं। हरिता ने धीरे से कहा, "आलिका....मतलब चलो, हम तुम्हें यहाँ से ले चलते है। और वे सब पार्वती को लेकर घने जंगल में चली गईं। जंगल बहुत सुन्दर था। वहाँ उन्होंने एक बड़ी गुफा देखी। सहेलियों ने मिलकर गुफा को सजाया। मालती फूल तोड़ लायी, जूही ने पत्तों का पर्दा बनाया, चम्पा ने छोटे-छोटे पत्थरों से शिव जी की मूर्ति बनाई। हरिता ने पार्वती के लिए पत्तों की चटाई बनायी। अब जंगल ही पार्वती की पाठशाला बन गया। कई दिन बीत गये। इधर महल में सब परेशान थे। जब पिता जी को जंगल में पार्वती मिली, तो उन्होंने देखा कि उनकी बेटी कितनी खुश और होशियार हो गई है। उन्होंने पार्वती की लगन देखी। पिता जी ने प्यार से कहा, "मुझे माफ कर दो बेटी! मैं समझ गया, सच्ची लगन के आगे तो सबको झुकना पड़ता है। तुम्हें जो बनना है, तुम वही बनो।" माँ ने कहानी खत्म की और कहा, "इसीलिए इसे हरितालिका कहते हैं- हरित यानी सहेली और आलिका यानी ले जाना। सहेलियों द्वारा ले जाई गई पार्वती की कहानी।"
#संस्कार_सन्देश -
तीज सिर्फ व्रत नहीं, सच्ची दोस्ती का त्योहार है। अगर दिल में सच्चा इरादा हो और साथ में अच्छी दोस्त हों, तो कोई भी कार्य कठिन नहीं है।
कहानीकार-
#मिथुन_भारती (स०अ०)
प्राथमिक विद्यालय बौखर
वि० क्षे०- सरीला, जनपद- हमीरपुर (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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