164/2026, बाल कहानी- 18 सितम्बर

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 164/2026
*18 सितम्बर 2026 (शुक्रवार)*
#बाल_कहानी - #इन्सानियत_की_झलक
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प्रयागराज के पास करपिया गाँव के प्राथमिक स्कूल में एक पुरानी घड़ी लगी थी। बच्चे उसे "घड़ी दादी" कहते थे। वो सिर्फ समय नहीं, समय का मतलब भी सिखाती थी। उसी स्कूल में कक्षा पाँच में स्वास्तिक नाम का लड़का पढ़ता था - होशियार और समय का बड़ा पाबंद। हेडमास्टर साहब ने ऐलान किया - कल 'समय का महत्व' पर भाषण प्रतियोगिता है, जीतने वाले को एक घड़ी इनाम में मिलेगी। स्वास्तिक ने रात भर तैयारी की। अगले दिन वह तीस मिनट पहले घर से निकला। रास्ते में तीन घटनाऍं हुईं - छोटी पिंकी की चप्पल टूट गई थी और वो रो रही थी। स्वास्तिक ने पाॅंच मिनट लगाकर उसकी चप्पल बाॅंध दी। आगे स्कूल के रामू काका भारी रजिस्टरों का झोला खींच रहे थे। स्वास्तिक ने वो झोला अपनी साइकिल पर रखकर स्कूल तक पहुॅंचाया। सात मिनट और लगे। गेट पर एक बूढ़ी अम्मा बैठी थीं, जिन्हें ब्लॉक में पेंशन फॉर्म जमा करना था। 9:55 बज चुके थे, भाषण दस बजे था। स्वास्तिक ने चपरासी भैया से कहकर अम्मा को ब्लॉक भिजवा दिया। जब वह हॉल पहुॅंचा तो 10:07 बज गए थे, उसका नम्बर निकल चुका था।

हेडमास्टर के पूछने पर स्वास्तिक ने माइक पर कहा- "सर, सर! मेरा किताबी भाषण तो रह गया, पर आज असली भाषण सीख लिया। मैं समझता था समय मतलब जल्दी भागना। आज समझा समय मतलब सही समय पर सही काम करना। अगर समय बचाकर हम इन्सानियत ही खो दें तो ऐसे समय का क्या फायदा?" इसके बाद स्वास्तिक ने पूरा वृत्तान्त हाॅल में बताया। पूरा हॉल तालियों से गूॅंज उठा। हेडमास्टर ने कहा, "आज का इनाम स्वास्तिक को नहीं, उसकी इन्सानियत को जाता है।"

#संस्कार_सन्देश -

समय का सबसे सुन्दर उपयोग किसी की मदद के लिए रुक जाना ही इन्सानियत है, जो घड़ी की टिक-टिक से नहीं दिल की धड़कन से चलती है।

कहानीकार- 
#शंखधर_द्विवेदी (स०अ०)
उच्च प्राथमिक विद्यालय (1-8) करपिया
वि० क्षे०- कोरांव, जनपद- प्रयागराज (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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