हे! मधुसूदन

 दोहा :-

(1)

मोर-मुकुट  कटि-काछिनी, मुरलीधर  घनश्याम।

प्रभु! मन-मन्दिर में बसो, निश-दिन आठहु-याम।।

                      (2)

गोबर्धन-गिरि  धार  कर, दीन्ह्यो  गोकुल  त्राण।

नयन-पुतरिया श्याम बन, आराधत  मम प्राण।।

                       (3)

वासुदेव - सुत - देवकी, हे! यशुमति  के  लाल।

रोंम  -  रोंम    रम   जाइये,  गोपेश्वर   गोपाल।।

मयंतगंद सवैया छन्द :-

-------------------------

मोहन माधव हे! मधुसूदन,

        नाथ! अनाथ, सनाथ बनाओ।

सागर की लहरें लहरैं जिमि,

        प्रेम - ध्वजा  उर में  फहराओ।।

रूप - अनूप अगोचर जो,

       मम-ध्यान रमै,अभिलाष जगाओ।

श्याम सुनो! 'निरपेक्ष' कहै,

         भवसागर 'तारक' पार कराओ।।


रचयिता

हरीराम गुप्त "निरपेक्ष"
सेवानिवृत्त शिक्षक,
जनपद-हमीरपुर।



Comments

Total Pageviews