154/2026, बाल कहानी- 05 सितम्बर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 154/2026
*05 सितम्बर 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी- #गुरुभक्त_कृष्णभक्त
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प्राचीन काल की गुरु-शिष्य परम्परा में जहाँ गुरु के द्वारा दिए गए आदेशों का शिष्य सदैव पालन करता आया है, वहीं आज सन्त उमापति दास जैसे विरले उदाहरण मिलते हैं।
इस घटनाक्रम की शुरुआत होती है, सन 1987 से जहाँ अपने परिवार के भरण-पोषण हेतु रोजगार के सिलसिले में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे उमानाथ मुम्बई जीविकोपार्जन हेतु चले जाते हैं।
एक दिन जुहू की सड़कों पर भक्तों द्वारा विक्रय की जा रही श्रीमद्भगवद्गीता का क्रय करते हैं। जब श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ना आरम्भ करते हैं, तो मात्र 8 दिन के उपरान्त पूरी श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेते हैं। मन में इच्छा उत्पन्न होती है कि आखिर जिस संस्थान के द्वारा यह पुस्तक प्राप्त हुई है, वह संस्थान कहाँ है?
आस-पास पूछने पर पता चलता है कि यह संस्थान इस्कॉन टेंपल जुहू में ही स्थित है। जैसे ही जुहू स्थित इस्कॉन टेंपल में पहुँचते हैं, वहाँ उनकी मुलाकात गुडाकेश से होती है। भक्ति सम्बन्धी पृच्छा करने के उपरान्त नियमित रूप से मंगल आरती में शामिल होने लगते हैं। एक दिन दीक्षा लेने वालों की कतार में खड़े होते हैं, तो गुरु के पास पहुँचते ही पता चलता है कि सूची में उनका नाम ही नहीं है। मन्दिर से बाहर निकलने लगते हैं तो पीछे से आवाज आती है कि महाराज जी आपको बुला रहे हैं।
जैसे ही संत श्री गोपाल कृष्ण जी महाराज से मुलाकात होती है, तो महात्मा जी नाम पूछते हैं और उत्तर में 'उमानाथ' सुनते ही कहते हैं कि, "आज से तुम्हारा नाम उमापति दास है।" कुछ दिन के पश्चात महात्मा जी कहते हैं कि, "उमापति! तुम्हें भगवान कृष्ण की भक्ति के लिए नियमित रूप से रहना चाहिए।" उत्तर में उमापति जी कहते हैं कि, "प्रभु! अभी मेरे ऊपर परिवार की जिम्मेदारियाँ हैं। मेरे दो भाई अभी पढ़ाई कर रहे हैं, जिनकी जिम्मेदारी मेरे कन्धे पर है। जब मैं इन जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाऊँगा, तब मैं पूरी तरह से समर्पित हो पाऊँगा।"
इस तरह से दो वर्ष बीत जाते हैं और उनके एक भाई राजनाथ बीएसएनएल में इंजीनियर हो जाते हैं। इसके पश्चात उमापति महात्मा के पास पहुँचते हैं और कहते हैं कि, "अब मैं पूरी तरह से निश्चिन्त हूँ।" परम पूज्य गोपाल जी महाराज आदेश देते हैं कि, "तुम्हें इस्कॉन टेंपल, नैरोबी (केन्या) धर्म-प्रचार हेतु जाना होगा।" जल्द ही वीजा-पासपोर्ट इत्यादि बनवाकर गुरु के आदेश को सर-माथे पर रखते हुए उमापति अपनी पत्नी श्यामा प्रिया के साथ 1989 में नैरोबी, केन्या के लिए प्रस्थान करते हैं।
जिस समय वह नैरोबी, केन्या में पहुँचते हैं, जैसे ही वहाँ का पानी पीते हैं, तो कहते हैं कि, "जहाँ का जल इतना मीठा है, तो यह धरती अच्छी है। अब यहाँ से बिना कुछ प्राप्त किए नहीं जाऊँगा।" उस समय मन्दिर की स्थिति ऐसी हो चुकी थी कि मन्दिर में प्रसाद चढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। आए दिन चोर आते और कभी मन्दिर की मूर्ति, तो कभी दान-पेटी लूट ले जाते थे। परन्तु अपनी बुद्धिमत्ता और जीवटता का परिचय देते हुए, उमापति दास धीरे-धीरे भारतवंशियों से सम्पर्क करते हैं। वह जिस भी भारतवंशी से मिलते, उनसे उनका विजिटिंग कार्ड ले लेते और बाद में उनसे बात करते और सहयोग हेतु प्रेरित करते। धीरे-धीरे मन्दिर की व्यवस्था में सुधार होने लगा।
उनकी इस कर्मठता को देखते हुए श्री गोपाल कृष्ण महाराज के आदेश पर उन्हें इस्कॉन, नैरोबी (केन्या) का उपाध्यक्ष नामित किया गया। वक्त का दस्तूर धीरे-धीरे बदलता गया और अपनी कार्यकुशलता के दम पर संत उमापति दास ने इस्कॉन टेंपल, नैरोबी (केन्या) के नाम पर सैकड़ों एकड़ जमीन, खेती, पशुपालन और भक्तों के रहने के लिए गेस्ट हाउस भी बना लिया। कोविड काल में जहाँ पूरी दुनिया संकट का सामना कर रही थी, वहीं संत उमापति दास ने नियमित रूप से इस संकट के समय हजारों भक्तों के आहार और जरूरत की वस्तुओं का प्रबन्ध किया।
5 मई 2024 को इस्कॉन के प्रमुख परम पूज्य गोपाल कृष्ण जी महाराज के निधन के उपरान्त संत उमापति दास को इस्कॉन पूर्वी अफ्रीका व मध्य अफ्रीका का जोनल सचिव घोषित किया गया और अफ्रीका का प्रमुख ट्रस्टी घोषित किया गया। जनवरी 2025 में संत उमापति दास ने इस्कॉन के अधिकृत दीक्षा-गुरु के रूप में शपथ ली।
संसार में ऐसे भक्त विरले ही देखने को मिलते हैं, जो गुरु के एक आदेश के उपरान्त भगवद्-भक्ति के लिए अपना परिवार ही नहीं, बल्कि देश छोड़कर गुरु की आज्ञा पालन करने हेतु विदेशों में धर्म-प्रचार करते हैं।
#संस्कार_सन्देश -
गुरु की आज्ञा में जीवन को समर्पित करने वाला, विश्व के पटल पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करता है।
कहानीकार -
#दीपक_कुमार_यादव (स०अ०)
प्रा० वि० मासाडीह,
महसी, बहराइच (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद #दैनिक_नैतिक_प्रभात
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