115/2026, बाल कहानी- 16 जुलाई
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 115/2026
*16 जुलाई 2026 (गुरुवार)*
#बाल_कहानी - #खुशियों_का_एटीएम
---------------------
घर में बच्चों की रौनक से आशाओं का मेला भरा है। एक तरफ झुला, दूसरी तरफ क्रिकेट की दौड़ लग रही है। खेलते हुए बच्चे कितने प्यारे लड़ते-झगड़ते, फिर एक हो जाते।
पाँच साल की नन्हीं रिद्धि अभी-अभी शिकायत कर कहने लगी, "दादी! देखो न, सिद्धि ने मुझे चिमटी काटी है।" और वह रुआँसी हो उठती है। थोड़ा पुचकारने पर फिर बहन को गले लगाती है।
कुछ देर बाद ही सिद्धि आकर कहती, "ओ दादी! रिद्धि ने मेरे गाल में मारी, बाल खींची।" बड़े- बड़े आँसू, फिर थोड़ा मनाते हुए दंत पंक्तियाँ बाहर हो गई।
रिद्धि को बुलाकर दादी कहती, "चलो, गले लगो! एक दूसरे को प्यार करो।" दोनों बाबू भैया के साथ खुशी-खुशी झूले में झूलने लगीं।
कुछ देर बाद "दादी.. दादी! देखो न, बाबू भैया ने चिढ़ाया है। जीभ निकालकर, मारूँ क्या बोले हैं।"
आठ वर्षीय नाती बाबू झट से कहता, "नानी.. नानी! मैं नहीं बोला हूँ। ये ही मुझे बोली, बड़ा आया है। तेरा झूला नहीं है," बोली।
फिर बच्चों को झट से समझाती मम्मी, "नहीं बेटा! बाबू भैया आपका बड़ा भाई है न, ऐसा नहीं कहते। आप को आईसक्रीम खाना पसन्द है न, मैंगो शेक बनाना है ना?" सुनते ही खुशी से उछलकर सब हँस पड़े।
बच्चे एक साथ मिलकर फिर खेलते हुए खाने की सभी चीजें आपस में बाँटते हैं। पड़ोसी बच्चों को भी बुलाकर देते हैं, साथ रहते हैं।
गाय, बछड़े के पास जा रोज बातें करते हैं। पास की दुकान से केवल पाँच-दस रुपए की चॉकलेट लाकर ढेरों खुशियाँ बिखेरते हैं।
गर्मी की अधिकता से बाहर जाने की मनाही। दिन में ग्यारह बजे तक खेल के बाद बोर के मोटे धार में कूद-कूदकर नहाते, पानी सींचते है। निर्झर झरने का संगीत है, मानो बचपन और ये गूँजती किलकारी जिन्दगी दे जाती है।
फूलों से बातें करते मस्ती की फुलझड़ी आँगन की बगिया में महकता बचपन सचमुच भोला-भाला निश्छल, बहती गंगा की पावन धारा।
भेदभाव से मुक्त बचपन जीवन के हर गम मुक्त दुनिया के धोखे से दूर। बच्चों की खुशी देखकर गीत याद आ गया। बचपन हर गम से बेगाना होता है। पेड़ के नीचे बच्चे आँख-मिचौली के खेल में हार के भी जीत जाते हैं।
आँखों में लगी यह पट्टी जीवन के अन्धे कानून से मुक्त है।
पंछी जैसे गगन के में उड़ते चहकते खिलखिलाते है। सचमुच जमीं के तारे-सितारे ।
बच्चों के साथ खेल में शामिल दादी की आँखें ममता से नम हो गई। अपने नाती-पोतियों को बाँहो में भरकर कह उठती हैं, "बच्चों! ये बचपन और तुम्हारी खुशियों का एटीएम कभी न खत्म हो। बचपन कितना प्यारा है! तू सचमुच भोला-भाला निश्छल दुनिया के गम से दूर, भेदभाव से मुक्त।
#संस्कार_सन्देश -
बचपन छल-कपट और भेद-भाव से रहित प्रेमपूर्ण जीवन का नाम है। बच्चों से हमें यह सीखना चाहिए।
कहानीकार-
#अमितारवि_दुबे (पू०प्रा०)
शासकीय सुखराम नागे महाविद्यालय छिपली
तहसील- नगरी, जिला- धमतरी, छत्तीसगढ़
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
Comments
Post a Comment