103/2026 बाल कहानी- 02 जुलाई

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 103/2026
*02 जुलाई 2026 (गुरुवार)*
#बाल_कहानी - #हे_राम_बिजली_फिर_चली_गई!
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गर्मी की छुट्टियाँ हो गई थीं। राजू मुनिया और सारे बच्चे घर की तरफ ऐसे भागे जा रहे थे जैसे उनके पंख निकल आए हों। वे बाहर घूमने जा रहे थे। वह वहाँ के आनन्द में निमग्न थे। कुछ को अपने गाँव में ही रहना था। उनका अलग समूह बन गया था कि हर दिन कौन-सा खेल खेला जाएगा। गाँव में ही अलग-अलग सुन्दर जगह पर पिकनिक मनायी जाएगी आदि आदि। राजू और मुनिया भी इस बार गाँव में ही रहने वाले थे क्योंकि मुनिया के माता-पिता भी उनके ही घर आ रहे थे। कुल मिलाकर उत्सव जैसा वातावरण हो गया था। बच्चों के आह्लाद भरे शोर गुल से गाँव की गलियाँ चहक उठी थीं। घर के लोगों ने भी यह मान लिया था कि ये नन्हे शैतान अपने पंख पसारे बेहिसाब उड़ेंगे। राजू मुनिया ने भी घर पहुँच अपना बस्ता पटका और दादी से लिपट गए। थोड़ी ही देर में उन्होंने दादी को न जाने कितनी योजनाओं से परिचित करा दिया, जो उन्हें इसी गर्मी की छुट्टियों में पूरी करनी थीं। दादी खूब मनोयोग से उनकी बातें सुनती रही और इसी शोर शराबे में दिन बीत गया। 
रात होते-होते मुनिया के माता-पिता भी आ गये। अब क्या कहना था? घर में लग रहा था त्योहारों का मौसम आ गया हो। खाते-खाते ना जाने कितनी बातें!! तभी रंग में भंग पड़ गया बिजली चली गई थी। 
"आजकल बिजली कुछ ज्यादा ही कट रही है। मुनिया की मामी ने कहा। सब का उमस और पसीने से बुरा हाल था। बिजली के बिना नींद कैसे आएगी? दादी चुपचाप राजू और मुनिया को पंखा झलने लगी। कोई सरकार को कोस रहा था तो कोई विद्युत विभाग को, पर दादी बिल्कुल चुप थी। 
"अरे दादी! आप भी तो कुछ बोलो ना.. आपको क्या लगता है, इतनी गर्मी में सरकार को पावर कट करना चाहिए क्या?सबको सुविधा देना सरकार की जिम्मेदारी है। है ना नानी?" मुनिया किंचित रोष से बोली, "हाँ!" दादी ने कहा, "पर यह बताओ, आज अगर तुम्हारी माँ ने उतना ही खाना बनाया होता, जितना वह रोज बनाती है तो क्या सबका पेट भरता?" 
"अरे नानी! लोग बढ़ेंगे तो उतने ही से कैसे काम चलेगा? हाँ! और ऐसे सोचो कि मान लो खाने की मात्रा कम हो लेकिन कोई भी खाना बर्बाद ना करें तो भी सबका पेट लगभग लगभग भर ही जाएगा।" माँ अब कहानी की जगह पहेलियाँ बुझाने लगी। "क्या?" राजू के पिता मुस्कुराते हुए बोले, "साफ-साफ बोलो, कहना क्या चाहती हो? दादी ने गला साफ किया और बोली, "मतलब यह कि जिम्मेदारी सबकी है और सबको निभानी भी पड़ेगी। 
"कैसे?" नानी मुनिया ने जिज्ञासा दिखाई। अब सबकी उत्सुकता बड़ी क्योंकि बिजली संकट से सब उबरना चाहते हैं। हमें एक भी बल्ब फालतू नहीं जलाना चाहिए। अगर परिवार लंबा है तो भी जमीन पर बिस्तर बिछाकर एक पंखे एक कूलर या एक एसी से काम चलाया जा सकता है। बिजली के उपकरणों का कम से कम प्रयोग करें। कमरे से निकलने पर पंखा, कूलर, एसी लाइट अवश्य बंद कर दें। प्रधानमंत्री सोलर योजना पीएम सूर्य घर का लाभ लेना चाहिए। इससे हम जहाँ और बिजली का उत्पादन कर पाएँगे, वहीं छत भी अपेक्षाकृत ठण्डी रहेगी। अगर हर व्यक्ति ऐसी सोच के साथ चले तो विद्युत पर पड़ने वाला भार बहुत कम हो जाएगा।" सब ध्यान से दादी की बातें सुन रहे थे। इतने में बिजली आ गई। सबके चेहरे रोशनी और प्रसन्नता से चमक उठे। अचानक मुनिया के माता-पिता उठे और अपना बिस्तर वहीं दादी के पास बिछा लिया। राजू की माँ रसोई बाकी कमरों की और गेट लाइट बंद करने दौड़ी। इसी बीच राजू के पिता ने भी अपना बिस्तर वहीं पास में लगा लिया। हमारी जिम्मेदारी तो शुरू हो गई। अब राजू कल हम अपनी सारी टीम को भी यह जिम्मेदारी सिखाएँगे ताकि हे राम! बिजली फिर चली गई! जैसे संकट कम हो सकें। 
सब हँसने लगे।

#संस्कार_सन्देश -
व्यवस्थाएँ भली प्रकार चलती रहें। यह न केवल सरकार की बल्कि हमारी भी जिम्मेदारी है

कहानीकार-
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝#मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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