माँ

मैं कबसे बैठा सोच रहा,

मन मेरा मुझको कोच रहा।

पुरवार कुछ ऐसा व्यंग्य करो,

शब्दों का वार कर जंग करो।

अक्षर को जोड़ो-तोड़ो तुम

भावों का  इनमें रंग भरो,

शब्दों से सुन्दर चित्र बना,

तुम इस दुनिया को दंग करो।

तब एक विचार मन में आया,

एक शब्द जो मुझसे टकराया।

शुरूआत करूँ मैं कैसे अब,

ये भी न समझ मुझको आया।

लेकर मैं कलम तैयार हुआ,

उस शब्द से मुझको प्यार हुआ।

तब लिखने की शुरूआत हुई,

कागज व कलम की बात हुई।

जिसका वर्णन करना है यहाँ,

वो एक प्यारा सा शब्द है "माँ"।

माँ शब्द बहुत है छोटा सा,

विस्तार है इसका बहुत बड़ा।

हर मुश्किल बाधा से लड़कर,

मुझको पैरों पर किया खड़ा।

नौ माह उस माँ ने पाला है,

जो कहती मुझको लाला है।

गोदी में मुझे सुलाया है,

अपने हाथों से खिलाया है।

हर एक जंग को जीतूँगा,

मुझे माँ ने दूध पिलाया है।

पूरी करती हर मन्नत है,

माँ के पैरों में जन्नत है।

खामोशी जो सुन लेती है,

बेरूखी मेरी सह लेती है।

एक वही है पूरी दुनिया में,

जो यह सब कुछ कर लेती है।

माँ मे होती वह शक्ति है,

माँ कभी नहीं थक सकती है।

माँ का दुलार,

और माँ का प्यार।

बच्चों को मिलता है अपार।।

आशीष है माँ का मेरे साथ,

मुझको न मिलती कहीं हार।

मुश्किल में जब बच्चा होता,

माँ सुन लेती उसकी पुकार।

माँ शक्तिरूप है गुणाधार,

माँ से ही मिले मुझे संस्कार।

माँ के बिन सूना परिवार,

माँ है स्वंय एक संसार।

ममता और त्याग की मूरत है,

माँ प्रथम गुरु की सूरत है।

न केवल जीवनदाता है,

अपितु माँ भाग्यविधाता है।

सिर्फ शब्द नहीं एहसास है माँ,

हर एक सुख-दुख में पास है माँ।

होती न कभी निराश है माँ,

बस इसीलिए तो खास है माँ।

आओ माँ की वंदना करें,

और अपनी माँ को पूजें हम,

हर वक़्त रहेगी साथ तेरे,

फिर भले ही दुनिया जाए थम।

अपनी माँ का सम्मान करो,

और जग में ऊँचा नाम करो।

माँ के चरणों की रज लेकर,

ऐसा विशेष कुछ काम करो।

यह सब लिखकर मैं धन्य हुआ,

मन मेरा बहुत प्रसन्न हुआ।।


रचयिता

अंकुर पुरवार,

सहायक अध्यापक,

उच्च प्राथमिक विद्यालय सिथरा बुजुर्ग,

विकास खण्ड-मलासा,

जनपद-कानपुर देहात।

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