81/2026, बाल कहानी- 04 मई
#दैनिक_नैतिक_प्रभात- 81/2026
*04 मई 2026 (सोमवार)*
#बाल_कहानी- #भिक्षावृत्ति_अपराध_है
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एक दिन जंगल के राजा शेरसिंह वेश बदलकर मन्त्री गजराज के साथ अपने राज्य का हाल-चाल जानने के लिए निकले। उन्होंने सोचा- चलो, पहले भगवान के दर्शन कर लेते हैं। पर यह क्या? वे जैसे ही मन्दिर के पास पहुँचे, भिखारियों ने उनका रास्ता रोक लिया। एक दो नहीं कई भिखारी थे और अधिकाँश हट्टे-कट्टे स्वस्थ, जो कोई भी काम कर सकते थे। खैर, जैसे-तैसे निकल कर उन दोनों ने भगवान के दर्शन किये और बाहर आ गये। पर राजा का मन खिन्न हो गया था। राजा ने देखा कि कुछ दर्शनार्थी शान्ति से बैठकर पेड़ों पर रहने वाले बन्दर, गिलहरी, कबूतर आदि को केला, मूँगफली दाना आदि खिला रहे थे, पर ये भिखारी वहाँ भी पहुँच गये।
राजा को बहुत निराशा हो रही थी कि उनके रहते प्रजा को कितनी परेशानी हो रही है। लोग यहाँ शान्ति और आराम के लिये आते हैं, पर इन भिखारियों के कारण उनका सारा उत्साह और शान्ति खत्म हो जाती है। लोग एक-दो विकलाँग या मजबूर लोगों पर दया दिखाकर भीख दे सकते हैं, पर इन सैकड़ों की संख्या में हट्टे-कट्टे लोगों को क्यों भीख दें? अपनी मेहनत की कमाई इन लोगों पर क्यों खर्च करें?
राजा का मन बहुत बैचेन था। उसे लग रहा था कि एक ओर गरीब आदमी मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं दूसरी ओर ये हट्टे-कट्टे लोग भीख माँगकर मुफ्त का खा रहे हैं। ये तो धरती पर बोझ ही है। एक तरह से राष्ट्र निर्माण में भी इनका कोई सहयोग नहीं है। इनका कोई तो उपाय करना पड़ेगा।
दूसरे दिन राजा ने मन्त्री को आदेश दिया कि, "राज्य में घोषणा की जाये कि राजा के यहाँ भण्डारा है। सभी भिखारी एक सप्ताह तक राजा के यहाँ भोजन करें।" फिर क्या था? भिखारी क्या.. कुछ मुफ्तखोर भी भोजन करने आ गये। राजा ने सबको भोजन कराया फिर सबकी एक सभा बुलाई। उसमें सभी भिखारियों से पूछा कि, "आप सब भीख क्यों माँगते हो?" सभी ने अपना-अपना रोना सुनाया। महाराज हमें काम नहीं मिलता। राजा ने कहा, "कोई बात नहीं... आज से तुम्हारे खाने-पीने का प्रबन्ध हम करेंगे।" सब भिखारी बड़े खुश कि अब तो उनके मजे ही मजे हैं।
राजा ने फिर अपने मन्त्री को आदेश दिया कि, "इन सबको जहाँ पुल और सडकें बन रहे हैं, वहीं ले जाओ। ये दिन-भर वहाँ काम करेंगे और शाम को यहाँ आकर भोजन करेंगे। भोजन के उपरान्त सबको जेल में बन्द कर देना।" जेल का नाम सुनकर तो सब रोने गिड़गिड़ाने लगे। "महाराज हमें छोड़ दीजिए! हमने कोई अपराध तो किया नहीं, फिर जेल क्यों?"
"अपराध? ये मुफ्त का खाना और शराब आदि पीना क्या अपराध नहीं है? तुम देश के लिए क्या कर रहे हो? तुम सब से अच्छे तो वह गरीब लोग है जो मेहनत-मजदूरी करके अपना और अपने परिवार का पेट भर रहे हैं। कम से कम बोझ तो नहीं है देश पर। "
"नहीं महाराज! हमें छोड़ दीजिए। अब हम भीख नहीं माँगेंगे, हमें माफ कर दीजिए।"
"अच्छा ठीक है। हम तुम्हें छोड़ देंगे, पर एक सप्ताह तो तुम्हें सड़क निर्माण में काम करना ही होगा ताकि तुम्हें पता चल सके कि जो पैसा तम लोगों से मुफ्त में माँगते हो, यह कितनी मेहनत से आता है। तुम धर्म के नाम पर एक माँ से बच्चे के दूध के पैसे माँग लेते हो, सब्जी बेचने वाली बूढ़ी माँ से उसके भोजन का हिस्सा माँग लेते हो। तीर्थयात्रियों को भी माँग-माँगकर परेशान करते हो। रेल, अस्पताल सभी जगह तुम लोगों का मुक्त का धन्धा चलता है। तुम सबको पता होना चाहिए कि भिक्षावृत्ति एक अभिशाप और अपराध है।"
फिर राजा ने मन्त्री से कहा-
"मन्त्री जी! राज्य में मुनादी करा दीजिए कि आज से भिक्षावृत्ति अपराध माना जायेगा। जो स्वस्थ व्यक्ति भीख माँगता मिलेगा, उसे सजा होगी, हाँ! और राज्य में जो बृद्ध, बीमार और अशक्त हैं उनकी सहायता का प्रबन्ध राज्य की ओर किया जाये ताकि उन्हें भी किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।"
राजा के इस आदेश से सभी लोग खुश हो गये।
#संस्कार_सन्देश-
हमें भिखारियों को राष्ट्र की मुख्य धारा में जुड़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें कर्म करने पर बल देना चाहिए।
कहानीकार-
#जमीला_खातून (से०नि०अ०)
प्रा० वि० गड़धुरियागंज
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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