ईश्वर का फ़रिश्ता
तू धारा है दरिया की,
तूफानों से तू लड़ती है;
हौंसला, हिम्मत, जोशीली,
पत्थर को पानी करती है;
तू शांत है, सैलाब भी,
तू सौम्य, माँ सी योद्धा भी;
नम्र हृदय तेरा गहना,
तुझसे ही परिवार जहां भी;
नन्हीं किलकारी बन के,
जिस घर में तू जन्मती है;
धन्य है वो निकेतन,
जिसकी रानी तू बनती है;
कहाँ कहूँ तेरा ठिकाना,
पर्वत पे फतह करती है;
तू कमतर नहीं, कमज़ोर नही,
दुनिया को हिला सकती है;
चन्दा सा मनोहर मुखड़ा है,
ममता का सुंदर टुकड़ा है;
तेरी गोद निंदिया का झूला,
ईश्वर का जैसे फ़रिश्ता है;
क्या तुझे नाम दूँ हे नारी!
संघर्ष को हँसके सहती है;
दिल को कोमल विह्वल करके,
ख़ुदा की महिमा कहती है!
रचयिता
मीरा कन्नौजिया,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय हरखपुर,
विकास खण्ड-सिकरारा,
जनपद-जौनपुर।

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