होली का रंग
भूल सभी संदेश होली का
चढ़ा बाजार का रंग।
सीख किसी को याद नहीं
करते हैं हुड़दंग।
भाव नहीं है, प्रेम नहीं है
बस दिखावा और शान।
रंगों में भी घुला- मिला अब
रील, मीडिया का संग।
मिठास भरे रिश्ते- नाते
होते जा रहे भंग।
हँसी ठिठोली कम हुई बस
फोटो में खुशहाली की जंग।
नहीं रहा वह प्यार पुराना,
न ही रही वह रीति।
गले मिलें जब भूल के बैर
यही थी सच्ची प्रीति।
आओ फिर से दोहराएँ
होली का सन्देश।
मन के मैल जलाएँ सब
रंगें प्रेम विशेष।
न हो कोई दुखी यहाँ
कुछ ऐसा गुलाल उड़ाएँ।
प्यार, क्षमा और करुणा रंग में
रंगों को फैलाएँ।
रचयिता
डॉ0 निशा मौर्या,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मीरजहांपुर,
विकास खण्ड-कौड़िहार-1,
जनपद-प्रयागराज।

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