40/2026, बाल कहानी- 10 मार्च

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 40/2026
*10 मार्च 2026 (मंगलवार)*
#बाल_कहानी- #विकार
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एक दिन की बात है, देवराज इन्द्र भरी सभा में अपनी पत्नी शची के साथ ऊँचे सिंहासन पर बैठे थे। उनचास मरुदगण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनी कुमार, ब्रह्मवादी, मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वर से देवराज इन्द्र की कीर्ति का गान हो रहा था। ऊपर की ओर चन्द्रमण्डल के समान सुन्दर छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोजित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाज में देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे। देवराज इन्द्र अपनी शची के प्रेम और गहन मोह और देवराज मद के कारण नृत्य और संगीत में इतने मस्त थे कि उन्हें इस बात का भान ही न रहा कि देवगुरु बृहस्पति कब सभी में आये और कब लौटकर चले गये। सभी ने उनके आगमन पर उन्हें उठकर प्रणाम किया, किन्तु देवराज इन्द्र अपने मद और प्रमाद में ऐश्वर्य के मद में यों ही बैठे रहे। यहाँ तक कि वह अपने आसन से हिले-डुले तक नहीं। न खड़े हुए और न गुरु का आदर-सत्कार किया। त्रिकालज्ञ गुरु समझ गये कि यह ऐश्वर्य मद का दोष है।
उसी समय गुरु के चले जाने पर शची के ध्यान दिलाने पर जब देवराज इन्द्र को चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरु की अवहेलना की है। वह भरी सभा में स्वयं अपनी निन्दा करने लगे, "हाय-हाय! बड़े खेद की बात है कि भरी सभा में मूर्खतावश मैंने ऐश्वर्यमद में चूर्ण होकर अपने गुरुदेव का तिरस्कार किया। सचमुच मेरा यह कर्म अति निन्दनीय है। भला कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्ग की लक्ष्मी को पाने की इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसी ने मुझ देवराज को भी असुरों के से रजोगुणी भाव से भर दिया। जो लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासन पर बैठा हुआ सम्राट किसी के आने पर न उठे, वे धर्म का वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। ऐसा उपदेश करने वाले कुमार्ग की ओर ले जाने वाले हैं। वे स्वयं घोर नरका में गिरते हैं। उनकी बात पर जो विश्वास करते हैं, वे पत्थर की नाव की तरह डूब जाते हैं। मेरे गुरुदेव ज्ञान के अथाह समुद्र हैं। मैंने कामना और आसक्तिमय होकर ऐश्वर्यमद से परिपूर्ण हो बड़ी शठता की है। अब मैं उनके चरणों में माथा टेककर उन्हें कैसे मनाऊँगा?"
देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि गुरु घर से निकलकर अन्तर्ध्यान हो गये। देवता असुरक्षित हो गये। असुरों ने गुरु विहीन इन्द्र पर आक्रमण कर स्वर्ग अपने अभीन कर लिया। सभी देवता क्षत-विक्षत होकर दु:खी हो ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी ने उन्हें त्वष्टा के पुत्र विश्वरुप के पास जाने को कहा। साथ ही उन्होंने कहा कि, "तुमने ऐश्वर्यमद में अन्धे और आसक्तिमय होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ और संयमी ब्राह्मण का सत्कार नहीं किया। तुम्हारी उसी अनीति के कारण आज तुम समृद्धशाली होकर भी निर्बल शत्रुओं से हार गये। देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु इसी दशा को गुरु का अनादर करने पर ही प्राप्त हुए थे। फिर गुरु भक्तिभाव से उनकी आराधना से ही वह धन-जन और धान्य से सम्पन्न हुए। भृगुवंशियों ने इन्हें अर्थशास्त्र की पूरी शिक्षा दे रखी है। इनका कोई भेद तुम्हें ज्ञात नहीं होता। वे चाहें जिस लोक को जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता, बड़ों, साधु-संतों, गोविन्द और गौओं को अपना सर्वस्व मानते और जिन पर इनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल और ह्रास नहीं होता। इसीलिए तुम लोग विश्वरुप की सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुम लोग उनके असुरों के प्रति प्रेम को क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे।" ब्रह्मजी को प्रणाम कर देवता विश्वरुप के पास गये और उन्हें हृदय से लगातार बोले, "बेटा विश्वरुप तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रम पर अतिथि के रुप में आये हैं। हम एक प्रकार से तुम्हारे पितर हैं। इसलिए तुम हम लोगों की समयोचित अभिलाषा पूर्ण करो। उन सत्पुत्रों का धर्म भी यही है कि वे अपने पिता और अन्य गुरुजनों की सेवा करें। वत्स! आचार्य वेद की पिता ब्रह्मा की, भाई इन्द्र की और माता साक्षात पृथ्वी की मूर्ति होती है। बहिन दया की, अतिथि धर्म की, अभ्यागत अग्नि की और जगत के सभी प्राणी अपने आत्मा की ही मूर्ति होते हैं। इस समय शत्रुओं से हम दु:खी हैं। तुम अपने तपोबल से यह दु:ख, दारिद्रय, पराजय टाल दो। तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अत: जन्म से ही हमारे गुरु हो। तुम्हें आचार्य के रुप में वरण करके तुम्हारी शक्ति से अनायास ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेंगे। वेदज्ञान को छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पन कारण नहीं है।"
जब देवराज ने देवों सहित इस प्रकार विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की तब विश्वरुप ने उनकी आज्ञा मानकर देवताओं की पुरोहिती बड़ी लगन से करने लगे। यद्यपि शुक्राचार्य ने अपने नीतिबल से असुरों की संपत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ विश्वरुप ने वैष्णवी विद्या नारायण कवच के प्रभाव से उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्र को दिला दी। इसी विद्या से सुरक्षित होकर इन्द्र ने असुरों की सेना पर विजय प्राप्त की थी।

#संस्कार_सन्देश -
हमें कभी भी धन, पद, ऐश्वर्यमद में माता-पिता, गुरु और बड़ों का अपमान नहीं करना चाहिए, अन्यथा इसका फल तुरन्त भोगना पड़ता है।

कहानीकार-
#जुगल_किशोर_त्रिपाठी (शि०मि०)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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