44/2026, बाल कहानी- 14 मार्च

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 44/2026
*14 मार्च 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी- अकेलापन
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रोज की तरह राजू और मुनिया उछलते-कूदते घर पहुँचे तो उन्हें दादी घर में नहीं मिली। राजू दादी-दादी करता सारा घर घूम आया, पर उसे दादी नहीं दिखी। मुनिया भी नानी को न पाकर परेशान हो गई। मुनिया अधीर होकर मामी से नानी के बारे में पूछने लगी, "अरे, परेशान न हो बच्चों!" राजू की माँ ने हँसकर कहा, "माँजी पड़ोस के ज्ञानेश के घर गयी है। अभी आती ही होगी।" बच्चे थोड़ी देर बाद खा-पीकर गृहकार्य करने बैठ गये। गृहकार्य करते-करते वह लोग बातें भी करते जा रहे थे। दादी के बिना कितना सूना लग रहा है। तभी दरवाजे पर हलचल हुई। बच्चे सब काम धाम छोड़कर दादी से लिपट गये। दादी ने भी उन्हें जी-भरकर लाड़ किया। बच्चे बोले, "दादी! आप कहाँ चली गई थी? मुझे आपके बिना जरा भी अच्छा नहीं लगता।" दादी मुस्कुरायी, पर उनके मस्तक पर चिन्ता की लकीरें थी। मुनिया ध्यान से उन्हें देख रही थी। उसे लगा कि ऐसा कुछ है जो नानी उनसे छिपा रही है, पर प्रकट में बोली, "राजू! अब बस भी कर! जा.. नानी के लिए पानी लेकर आ।"
राजू के जाते ही दादी की आँखें डबडबा आयीं। मुनिया ने नानी से हमेशा भावनात्मक संबल ही पाया था। उसने अपनी मजबूत नानी को इस रूप में नहीं देखा था
तब-तक राजू भी आ गया और दादी ने भी अपने को संभाल लिया। रात को जब बच्चों ने कहानी के लिए जिद की तो दादी पूरी दृढ़ता के साथ बोली, "आज मैं तुम्हें एक सच्ची कहानी सुनाती हूँ। पड़ोस के ज्ञानेश का घर एक खुशहाल घर था, जिसमें ज्ञानेश, उसकी बहन नंदनी माता-पिता और उसकी दादी रहते थे। दादी ज्ञानेश और नंदिनी को बहुत प्यार करती थी। जैसे- आप मुझे और मुनिया को।" 
राजू चिल्लाया, "हाँ.. हाँ ठीक..।" उसी तरह ज्ञानेश और नंदिनी तेजी से बड़े होने लगे। स्कूल छूटा.. नए-नए यार दोस्त बने और अब उनके जीवन में सबसे जरूरी था मोबाइल। स्कूल से लौटने पर दादी से लिपट जाने वाले बच्चे आज भी दरवाजे पर राह देखने वाली दादी को अनजाने ही उपेक्षित करने लगे। पिता बाहर के काम में और माँ घर के कामों में व्यस्त रहती। दादी भी माँ के कामों में हाथ बटाती। पर घर लौटते बच्चों से बात करने को तरस जाती। 
दादी ने एक दिन अपने पुत्र से कहा कि, "मेरा मन बहुत ऊबता है। पिता शाम को घर लौटते हुए दादी के लिए भी एक मोबाइल ले आये और उन्होंने ज्ञानेश, नंदिनी को हिदायत दी कि, "वह दादी को फोन चलाना सिखा दें।" दोनों बड़े चाव से उन्हें फोन चलाना सिखाने लगे। 
कुछ दिन तो दादी का मन बहला। वह देखती, सब देर तक फोन पर बातें करते हैं। दादी ने काँपते हाथों से अपने पोते को ही फोन मिला दिया। ज्ञानेश ने फोन न उठाया। उसे लगा कि दादी उससे सीधे बात कर सकती हैं और आज दादी की आँखें छलछला आयीं। ज्ञानेश की दादी चक्कर खाकर गिर पड़ी। आज मैं उन्हें ही देखने गयी थी। उनका इलाज चल रहा था, पर उनका मोबाइल देखकर ज्ञानेश बहुत पछता रहा है। बच्चों से बात करने को तरसती दादी रोज अपने पोते को ही फोन करती थी, पर उन्हें किसी ने भी फोन नहीं किया। उन्हें अकेलेपन की बीमारी है, पर हम ऐसा नहीं होने देंगे। अगर घर के दादा-दादी और नाना नानी अकेलेपन से ग्रस्त हैं तो जीवन में किसी भी उपलब्धि का कोई मतलब नहीं है।"

#संस्कार_सन्देश -
हमें अपने बड़ों को अवश्य समय देना चाहिए।

कहानीकार- 
डॉ० #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कंपोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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