39/2026, बाल कहानी- 09 मार्च
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 39/2026
*09 मार्च 2026 (सोमवार)*
#बाल_कहानी - #पहचान
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हर जगह अंग्रेजी की बहुतायत तथा अच्छी नौकरी पाने के लिए बोलचाल व व्यवहार में अंग्रेजी की अहमियत को अक्सर लोगों से सुनता व देखता हुआ, पहाड़ में रहने वाला नन्हा सुरेन्द्र मन ही मन अंग्रेजी भाषा को ही उन्नति का पर्याय मानने लगा। वह अपनी स्थानीय एवं राष्ट्र-भाषा के बनिस्पत् अंग्रेजी को प्राथमिकता देता और चाहता कि हर कोई उसकी बात समझे। कक्षा में उसका पूरा ध्यान आंग्ल भाषा को आत्मसात करने में लगा रहता। अंग्रेजी के अध्यापक के प्रति उसका सहज झुकाव तथा इस भाषा में वार्तालाप करने वालों को आदर्श मानते हुए अन्य विषयों के प्रति वह कभी गम्भीर नहीं रहा।
अंग्रेजी पर अधिक मेहनत करते हुए वह स्कूल व कालेज स्तर पर अंग्रेजी में टाँप करता हुआ होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर शीघ्र ही एक पाँच सितारा होटल में नौकरी पा गया और जल्दी ही विदेश चला गया। बोलचाल व व्यवहार में अब वहाँ पूर्ण रूपेण आंग्ल संस्कृति की प्रचुरता ने उसे मन ही मन अंग्रेज बना दिया, भले ही वह तन से गेहुँआ हिन्दुस्तानी दिखे।
अब उसका मन करता कि उसे इस पश्चिमी देश की नागरिकता प्राप्त हो जाए और स्थायी रूप में से वह यहीं कहीं बस जाए। वह अपने मूल गाँव, समाज व देश के प्रति विस्मृत भाव रख सेवारत देश के लोगों से निकटता बनाने की कोशिशें करता लेकिन उन्होंने उसे कभी कोई भाव नहीं दिया।
विदेशी धरती पर अवकाश के दिन एक बार सैर करता हुआ सुरेन्द्र एक शानदार पार्क के निकट पहुँचा और भारी भीड़ देख उसके कदम ठिठक गये। माइक पर हिन्दी में हो रहे उद्बोधन तथा अनेक अंग्रेज महिला-पुरुषों को हिन्दुस्तानी मूल के लोगों के साथ 'हरे रामा हरे कृष्णा' की धुन में थिरकते व गाते हुए देख उसके आश्चर्य की सीमा न रही। निकट जाने पर कई लोग नमस्कार व प्रणाम कहते हुए उससे बड़े आत्मीय भाव से मिले और बिना किसी भेद-भाव के हिन्दी में वार्तालाप करते हुए उसे सम्मान के साथ अपने ग्रूप का हिस्सा मानने लगे। उस कार्यक्रम में अनेक धुरन्धर भारतीय व विदेशी वक्ताओं द्वारा हिन्दी में व्याख्यान दिये जा रहे थे तथा भारतीय संस्कृति का सुन्दर महिमा-मंडन किया जा रहा था।
देर शाम इस कार्यक्रम का समापन हुआ और सभी आपस में प्रेम व सम्मान भाव प्रदर्शित कर गले मिले तथा नमस्कार कह अपने-अपने घरों को विदा हुए। सुरेन्द्र के पैर जैसे अब जमीन में कहीं गढ़ गये हों। पराई भूमि पर भारतीय संस्कृति के प्रति इतना निश्छल प्रेम व वार्तालाप देख-सुनकर उसे अपनी आँखों पर जैसे यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि तभी एक कोमल स्पर्श उसके कंधों पर हुआ। पीछे मुड़कर देखा तो साध्वी वेश में खड़ी एक भारतीय मूल की महिला का दिग्दर्शन उसे आह्लादित कर गया। उसने सुरेन्द्र की ओर एक कार्ड बढ़ाया और कभी इसी शहर में बने अपने आद्यात्मिक केन्द्र में आकर मिलने को कहा। साथ ही प्रणाम की मुद्रा में नतमस्तक होते हुए वह आगे बढ़ गईं।
सुरेन्द्र का मन अब भारी अन्तर्द्वन्द्व में डूब गया। जिस भाषा व संस्कृति के सम्बन्ध में वह कितने नकारात्मक विचार अपने मन में रखता रहा है, उसी भाषा व संस्कृति को विदेशी भूमि पर इतना मान-सम्मान प्राप्त हो रहा है? को देख-सुनकर वह हतप्रभ हुआ जा रहा था। अगले अवकाश दिवस पर सुरेन्द्र सीधे उस आद्यात्मिक केन्द्र पर जा पहुँचा और सभी के साथ प्रवचन कक्ष में पहुँचकर ध्यान से वक्ता को सुनने लगा। वक्ता द्वारा हिन्दी भाषा में बोलते हुए अन्त में कहा गया, "हिन्दी विश्व की समृद्ध भाषाओं में एक है और हर हिन्दुस्तानी के मन की आवाज है, पहचान है, आत्माभिमान है, सम्मान है।" उसे अ से अनार , आ से आम बोलते हुए बचपन में मुँह में आने वाले उन फलों का रस रह-रहकर याद आने लगा। उसे लगा कि उसको सुलाने के लिए बाल्यावस्था में उसकी माँ द्वारा पहाड़ी में बोली जाने वाली लोरी सहज ही निकलकर जैसे प्यारी-सी ममतामयी आँचल में आराम करने को उसे प्रेरित कर रही हो। सुमधुर वाणी में बोली जा रही। यह ध्वनि अब बार-बार उसके कानों में मिसरी-सी घुलती जा रही है और उसका मन अब रह-रहकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की यादों में खोता हुआ शीघ्र ही उन सबसे मिलने और स्थायी रूप से अपनों के बीच बसने को बेचैन सा होने लगा।
#संस्कार_सन्देश -
जब हम अक्षरों को समझ के आधार पर पढ़ते हैं तो वह अक्षर हमारे लिए बहुत कुछ प्रदान करन वाले हो जाते हैं।
कहानीकार -
#दीवान_सिंह_कठायत (प्र०अ०)
रा० आ० प्रा० वि० उडियारी बेरीनाग।
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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