पुस्तक जीवन की सखी तू
तू बचपन से प्रिय सहेली,
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
आधे कच्चे से, पूरे हुए हैं।
तू कविता, तू कहानी, तू नाटक,
तू ही जानकारी,
तेरे कितने-कितने रूप,
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
तू बचपन से प्रिय सहेली.....
बँधी कभी ना ..तू समय में,
ना दिन में, ना जगह में,
हर बंधनों से तू आज़ाद रही है
समाए असीम ज्ञान को खुद में,
तू जीवन का आधार रही है।
जब-जब तुझको याद किया है,
तब-तब तूने बस दिया ही दिया है।
सुख-दुःख, जीवन, ज्ञान की बातें,
तुझसे मैंने क्या कुछ ना जाना।
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
तू बचपन से प्रिय सहेली.......
रचयिता
रंजना राहजहा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय रेवाड़ी,
विकास खण्ड-मालवा,
जनपद-फतेहपुर।
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
आधे कच्चे से, पूरे हुए हैं।
तू कविता, तू कहानी, तू नाटक,
तू ही जानकारी,
तेरे कितने-कितने रूप,
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
तू बचपन से प्रिय सहेली.....
बँधी कभी ना ..तू समय में,
ना दिन में, ना जगह में,
हर बंधनों से तू आज़ाद रही है
समाए असीम ज्ञान को खुद में,
तू जीवन का आधार रही है।
जब-जब तुझको याद किया है,
तब-तब तूने बस दिया ही दिया है।
सुख-दुःख, जीवन, ज्ञान की बातें,
तुझसे मैंने क्या कुछ ना जाना।
संग तेरे ही बड़े हुए हैं,
तू बचपन से प्रिय सहेली.......
रचयिता
रंजना राहजहा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय रेवाड़ी,
विकास खण्ड-मालवा,
जनपद-फतेहपुर।

Nice poem
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