धरती की पुकार

न जीत है ये मेरी, न ये तेरी हार है,
वक्त का पहिया, कर रहा पलटवार है।
आँचल मेरा छलनी किया, विकास के नाम पर,
पाश बाँध दिया तूने, मेरी बहती धार पर।
स्वयं के हाथों कर रहा खुद का ही संहार है,

वक्त का पहिया कर रहा पलटवार है।

हाँ माता हूँ तेरी, अश्रुपूरित नेत्रों से
देख रही प्रदूषित धार को,
सुन सको तो सुन लो हे मानव,
अब भी मेरी करुण पुकार को।
न ले परीक्षा मेरी सहनशीलता की,
हो न जाये सर्वनाश जो तनिक भी अधीरता की।
काल रूपी दानव भर रहा हुंकार है,

वक्त का पहिया, कर रहा पलटवार है।

रचयिता
मुक्ता सिंह,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय खुरमानगर,
विकास खण्ड-खजुहा, 
जनपद-फतेहपुर।

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