पृथ्वी दिवस

पृथ्वी दिवस की कहानी
सुनो आज पृथ्वी की ही जुबानी।
पृथ्वी ने दी सुंदर प्रकृति
पृथ्वी ने ही तो दिया हवा और पानी।

पूरे ब्रह्मांड की थी जो रानी
सजी सँवरी ऐसे जैसे दुल्हन सयानी।
पहले सीना चीर अन्न बोया
फिर नदियों में पाप को धोया।

वन काटे बने नगर
धरा सहन की कठिन डगर।
तनिक शिकन नहीं धरा पर मगर
हवा पानी में भी जब घुला ज़हर।

अब न कोई चारा था
धरा का क्रोध बढ़ना गवारा था।
जब धरा का बड़ा क्रोध
लेने के लिए प्रतिशोध।

मानव को किया भीतर
अब तू रह घर पर।
मैं ख़ुद को जरा सँवार लूँ
अपने वन्य जीवों को भी प्यार दूँ।

पर धरा की देखो मेहरबानी
क्रोध में भी मनुष्य को देने की ठानी।
फल-फूल, साग-अन्न से धनवान
ताकि भीतर रहे, पर भूखा न रहे इन्सान।
     भूखा न रहे इन्सान

रचयिता 
मोनिका रावत मगरूर,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय पैठाणी,
विकास खण्ड-थलिसैण, 
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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