विश्व पृथ्वी दिवस
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आज 22अप्रैल है। आज
का दिन बहुत ही विशेष है क्योंकि इस दिन को पूरा विश्व अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी
दिवस के रुप में मनाता है। आखिर हमें पृथ्वी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस पर हमें विचार
करना चाहिए।
हमारी जन्मदात्री माता हमें जन्म देती है एवं उस समय तक हमारी परवरिश करती
है जब तक हम अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते और एक दिन वह हमारा साथ छोड़कर स्वर्ग
सिधार जाती है। लेकिन जन्मदात्री माता के सिवा हम सब की एक माता और भी है 'धरती माता' जो कि हमारी 'माँ की भी माँ' है और यह वह माँ है
जो हमारी देखरेख केवल शैशवावस्था या बाल्यावस्था तक ही नहीं करती बल्कि मृत्यु
उपरांत तक हमें शरण देती है, हमारी परवरिश करती है।
खाने के लिए भोजन,
वाहन
चलाने के लिए पेट्रोलियम,
पहनने
के लिए आभूषण, हरे-भरे वन, मनमोहक झरने, सागर, नदियाँ और वो सब
कुछ जो हमें व हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए आवश्यक है कि व्यवस्था करती है।
लेकिन हमारी अतिमहत्वाकांक्षी व स्वार्थी प्रवृति ने हमारी धरती माता के
अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। हमें कल्पना करनी चाहिए उस समय की जब पृथ्वी
वर्तमान स्वरूप में नहीं थी और हम अपने कर्मों से अपनी धरती माता को एक बार पुनः उसी
तरफ धकेलने में लगे हैं।
फलस्वरूप आए दिन नाना प्रकार की
प्राकृतिक आपदाएँ मुँह बाएँ खड़ी रहती हैं।
स्वार्थी मनुष्य पृथ्वी के अलौकिक सौंदर्य को मिटाने को आतुर है। जल, जंगल, जानवर ये पृथ्वी के गहना हैं। जिसे मानव जाति द्वारा अपने क्षणिक स्वार्थवश नुकसान पहुँचाया जा रहा है।वनों की अंधाधुंध कटाई ने वायु प्रदूषण के स्तर को अत्यधिक बढ़ा दिया है। जिसके लिए सरकार को समय-समय पर एडवाइजरी जारी करनी पड़ती है।
हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा जल से घिरा है, हमारे शरीर का भी
सत्तर प्रतिशत से अधिक भाग जल है। कहा भी गया है-'जल है तो कल है; जल है तो जीवन है'। लेकिन हम प्रकृति
की अनमोल धरोहरों को दूषित करने में लगे हुए हैं। फलस्वरूप जलीय जीवों पर संकट मंडरा
रहा है।
पृथ्वी की तीसरी अनमोल धरोहर जंगल को भी मनुष्य ने नहीं छोड़ा है। मनुष्य
अपना आशियाना बनाने व उद्योग धन्धे लगाने के चक्कर में वनों की अंधाधुंध कटाई में
लगा है वो ये भी नहीं सोचता कि इन्हीं से उसे जीवनदायनी गैस भी मिलती है। फलस्वरूप
पृथ्वी का तीसरा अनमोल उपहार जंगली जीवों का घर 'जंगल' सिकुड़ता जा रहा है। जिससे जानवरों की कई प्रजातियाँ
लुप्तप्राय हो गई हैं।
मनुष्य यह जानते हुए भी कि पृथ्वी ही वह इकलौता अनोखा ग्रह है जिस पर जीवन
सम्भव है। बावजूद इसके मनुष्य अनभिज्ञ बनकर हर स्तर पर इसका इसका अनावश्यक दोहन कर
रहा है। फलस्वरूप भूकंप, भूस्खलन, वैश्विक महामारी, जनसंख्या विस्फोट
आदि समस्याएँ सामने आ रही हैं।
अतः
हम भी चेतें औरों को भी चेताएँ।
अपनी व अपनी धरती माता की लाज बचाएँ।।
लेखक
बलजीत सिंह कनौजिया,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय सोनबरसा,
शिक्षा क्षेत्र-मनकापुर,
जनपद-गोण्डा।

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