गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ पूर्णिमा पावन दिन
श्रद्धा से नत हो जाता हूँ।
उस प्रथम गुरु मेरी माँ के
चरणों में शीश झुकाता हूँ।।

वर्षा की रिमझिम बूँदों से
जैसे धरणी की प्यास बुझे।
गुरु के पावन सानिध्य में ही
जीवन का कलुषित ताप घटे।।

चहुँओर खिली हरियाली है
यूँ हरी भरी हर डाली है।
जो शीतल मन्द बयार बहे
वैसी गुरुता की प्याली है।।

इस परम पुनीत क्षण में मैं आज
जिसके सम्मुख नतमस्तक हूँ।
वह महापुरुष मेरे गुरु हैं
जिनकी वीणा का सप्तक हूँ।।

रचयिता
अभिषेक गौरव,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय सकरा,
विकास खण्ड-सदर,
जनपद-गाजीपुर(उ.प्र.)

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