विश्व पर्यावरण दिवस

सिसक रही वसुंधरा,

देख के अपनी दुर्दशा;

विलुप्त होता जा रहा,

जो उसका श्रृंगार है।


हरियाली की उसकी चुनरियाँ,

नदियों की उसकी ध्वनियाँ;

हिमगिरि की उसकी चाँदनियाँ,

वायु की इसकी स्वच्छता;

सब नष्ट होती जा रही।


नजरें जहाँ तक हैं दौड़ती,

ऊँची इमारतें हैं गगन चूमती;

दफन है जिनके नीचे,

न जाने कितने ही पेड़ों की समाधियाँ।


ये जो साँस हम ले रहे,

विष रगों में अपने ही घोल रहे;

जल ही जल है हर ओर,

पीने को फिर भी तड़प रहे लोग।


हमारा जो लोभ है,

बन रहा अब प्रकोप है;


हर रोज़ पृथ्वी तप रही,

ज्वाला सी ये दहक रही;

सूखे पड़े है नदी, तालाब;

बेघर हुए हैं बेज़ुबान।


कचरे का जो लग रहा ढेर है,

तबाही का ये संकेत है;

हर तरफ है ये प्रदूषण घोल रहा,

जल, थल न वायु इससे बचा।


विनाश जो हम कर चुके,

भरपाई उसकी चलो करें;

वृक्ष लगाएँ मिलके सब,

हरा बनाएँ फिर से अब।

संसाधनों का करें सदुपयोग,

न हो जल का दुरुपयोग।


इस पर्यावरण दिवस पे,

ये संदेश सबको सुनाएँ

        "पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ;

        प्लास्टिक, प्रदूषण पर विराम लगाएँ।"


रचयिता

हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।

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