मैं भी तितली बन जाऊँ

मैंने देखी बाग में एक दिन
इक सुंदर प्यारी सी तितली
रंग-बिरंगे पंख फैलाकर
फूलों पर बैठी इक तितली।।

रंग-बिरंगे फूल खिले थे
प्यारी सी उस बगिया में
चारों तरफ हरियाली थी
खूब मगन थी प्यारी तितली।।

इस फूल से उस फूल तक
उड़ उड़ जाकर बैठी तितली
जग का कोई भान न था
काम में अपने लगी थी तितली।।

सोचा आज पकड़ लूँ उसको
डिबिया में कर लूँ मैं बंद
पर जैसे ही पास मैं जाऊँ
झट उड़ जाती सयानी तितली।।

देखा करता नित अब उसको
मुझको मन भाती प्यारी तितली
पंख हैं सुंदर कोमल लेकिन
दूर-दूर उड़ जाती तितली।।

देख के तितली सोचा करता
दूर जाते उसे देखा करता
मेरे भी गर पंख लग जाते
आसमान की सैर मैं करता।।

दूर-दूर फिर मैं उड़ जाता
सारे जग को देख मैं पाता
बन जाता मैं भी इक तितली।।
     
रचयिता
डॉक्टर नीतू शुक्ला,
प्रधान शिक्षक,
मॉडल प्राइमरी स्कूल बेथर 1,
विकास खण्ड-सिकन्दर कर्ण,
जनपद-उन्नाव।

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