अवतार लिए आ जाओ भगवन

अंधकार मय है जग सारा
प्रकाश को खा रहा अंधियारा,
कि फिर से आ जाओ श्री राम
पाप है बढ़ता जाए।

मानवता मर रही है क्षण-क्षण
मानव मानव का है दुश्मन,
रिश्ते नाते टूट रहे सब
संस्कार हैं छूट रहे सब।।

विश्वामित्र सा गुरु है ओझल
लक्ष्मण जैसा भाई मुश्किल
सीता सम संगिनी बने कोई कैसे
अग्नि-परीक्षा है पग-पग पर।

पिता दशरथ से हैं सैकड़ों
पर तुम सा पुत्र कहाँ से लाएँ
कि फिर से आ जाओ श्रीराम
पाप है बढ़ता जाए।।

गुरु को दक्षिणा ज्यादा प्रिय है
भाई हाथ में खंजर लिए है,
पत्नी को सास ससुर नहीं भाए
मित्र कहाँ जो अपना कहाए।

कौन है जो भूला मार्ग दिखाए
कौन है जो संजीवनी उठाए,
अभियंता अब कहाँ है वैसे
बिन भ्रष्टाचार जो सेतु बनाए।।

शबरी जैसा स्नेह कहाँ अब
चख चख कर जो बेर खिलाए,
कि फिर से आ जाओ श्रीराम
पाप है बढ़ता जाए

अवतार लिए आ जाओ भगवन
सृष्टि तो उजड़ी जाए।।

रचयिता
अंजली मिश्रा,
सहायक शिक्षिका,
प्राथमिक विद्यालय टिकरा,
विकास खण्ड-देवमई, 
जनपद-फतेहपुर।

Comments

Total Pageviews