आ अब लौट चलें
आज इस वैश्विक महामारी के दौर में मन बहुत व्याकुल हो रहा है। हमें यह सोचने या चिन्तन करने का समय है कि कहीं इन सबका कारण हम मनुष्य ही तो नहीं? इस आपाधापी के दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ में बहुत कुछ खोते जा रहे हैं। प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन, नित नए प्रयोगों तथा अन्य विभिन्न स्वार्थपरक गतिविधियों के द्वारा हम अपनी सीमाएँ लाँघ चुके हैं। निरीह व असहाय जन्तुओं का भक्षण, प्रकृति से खिलवाड़, सामाजिक वैमनस्यता आदि। आख़िर कब तक?
हमारी देवतुल्य भारत भूमि भी इससे अछूती नहीं रही। कहाँ हम प्रकृति को पूजते थे, पेड़-पौधों की अपने परिवार की भाँति रक्षा व ख्याल रखते थे, किसी भी काम की शुरुआत के पहले बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते थे। बिना उनके आशीर्वाद के कोई कार्य शुरू न करते थे। परन्तु आज हमारे पास इन सबके लिये समय ही नहीं है। कौन किसको धकेलकर आगे निकल जाए बस इसी प्रयास में हम लगे रहते हैं।
आज प्रकृति ने हमें यह यह सब सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि आख़िर हम सब कहाँ जा रहे हैं? हम बिना सोचे-समझे किस दिशा में बढ़े चले जा रहे हैं? क्या हम सब ये सही कर रहे हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं....
आज समय आ गया है हमें ख़ुद जगने का और एक शिक्षक होने के नाते सभी को जगाने का। यह प्रकृति और ये सुरम्य धरती हम सबकी है। सबका बराबर अधिकार है। किसी को कुचलकर आगे निकलना कभी भी लाभप्रद नहीं रहा है। समय बड़ा बलवान है। हमें हर जीव, हर प्राणी का सम्मान व यथा सम्भव रक्षा करनी चाहिए। जिन संस्कारों, रीतियों और आदर्शों को हम भूलते जा रहे हैं पुनः उन्हें आत्मसात करना है।
हम सब मानते हैं कि एक शिक्षक राष्ट्र निर्माता होता है। यदि हम सभी शिक्षक भाई-बहन ये संकल्प लें कि जो भी हमसे जाने-अनजाने गलतियाँ हो रही हैं उनका दोहराव न हो पाए और सभी मिलकर अपने स्तर से प्रयास करेंगे तो निश्चित रूप से वह दिन दूर न होगा जब हम सब मिलकर एक स्वस्थ व स्वच्छ राष्ट्र निर्माण में सफ़ल हो जाएँगे।
आज के समय में एक सार्वभौमिक सत्य भी सामने आ रहा है कि प्रकृति अपना संतुलन बना ही लेती है। उसने हमें समझाने के लिए हमारे सम्मुख भूकम्प, बाढ़ व ज्वालामुखी आदि को TLM की भाँति प्रस्तुत किया ताकि हम सब इनसे सीख सकें और अपनी गलतियों में सुधार कर सकें। परन्तु हम न ही सीखना चाहते हैं और न ही सुधरना।
वर्तमान में प्रकृति हमें इस अकल्पनीय नोवल कोरोना वायरस (कोविड-19) के माध्यम से जगाना चाह रही है। हम सब इसके लिए चाहे जिसे दोषी ठहराएँ किन्तु वस्तुतः दोषी हम लोग ही हैं।
हम सब को संकल्प लेना होगा कि हम जहाँ भी जिस भी रूप में प्रकृति से जुड़े हैं हम उस स्तर से इसके साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे। हम बच्चों को अपने संस्कारों, परम्पराओं व प्रकृति का सम्मान करना सिखाएँगे। हम सभी शिक्षक को आज ये आदर्श स्थापित करने की आवश्यकता है। जिसका अनुसरण करके स्वस्थ व समृद्ध राष्ट्र का निर्माण स्थापित हो सके।
वर्तमान में इस भयावह वायरस नोवल कोरोना (कोविड-19) हो हराने के लिए हम सब का सकारात्मक सोच के साथ एकजुट होने की जरूरत है, ताकि इस पर विजय प्राप्त की जा सके और इस प्रकार से इसे अपने देश से भगाया जा सके।
सरफ़रोशी और जज़्बे को बढ़ाती कुछ लाइनों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ-
मुश्किलें दिल के इरादे अपनाती हैं,
स्वप्नों के परदे निगाहों से हटाती हैं।
हौसला मत हार गिरकर ऐ मुसाफ़िर,
ठोकरें ही इंसान को चलना सिखाती हैं।
जय हिन्द, जय शिक्षक।
अर्चना सिंह,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय चाँदपुर,
विकास खण्ड-भिटौरा,
जनपद-फतेहपुर।

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