प्रातः काल का दृश्य
प्रातः काल का यह दृश्य निराला,
कितना स्वर्णिम कितना पावन,
चिड़ियों के स्वर और चहचहाते गुंजन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
पूरब में फैली लाल छटाएँ,
बिखरी किरणें चहुँ दिशाएँ,
व्याकुल मन को देती आश्वासन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
उगते सूर्य का दृश्य अलौकिक,
बड़ा अनोखा, बड़ा ही निर्मल,
जिसे देख मन हो जाता विह्वल,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
जो इस दृश्य का दर्शन पाए,
जीवन उसका धन्य हो जाए,
गूँज रहे गीत, वन उपवन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
रचयिता
प्रियदर्शिनी तिवारी,
प्रधानाध्यापिका,
संविलियन विद्यालय कुआंडीह,
विकास खण्ड-मंझनपुर,
जनपद-कौशाम्बी।
कितना स्वर्णिम कितना पावन,
चिड़ियों के स्वर और चहचहाते गुंजन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
पूरब में फैली लाल छटाएँ,
बिखरी किरणें चहुँ दिशाएँ,
व्याकुल मन को देती आश्वासन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
उगते सूर्य का दृश्य अलौकिक,
बड़ा अनोखा, बड़ा ही निर्मल,
जिसे देख मन हो जाता विह्वल,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
जो इस दृश्य का दर्शन पाए,
जीवन उसका धन्य हो जाए,
गूँज रहे गीत, वन उपवन,
करते हैं पुलकित हर तन, हर मन।
रचयिता
प्रियदर्शिनी तिवारी,
प्रधानाध्यापिका,
संविलियन विद्यालय कुआंडीह,
विकास खण्ड-मंझनपुर,
जनपद-कौशाम्बी।

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