माँ का सम्मान

जिस घर में माँ का सम्मान नहीं होता,
उस घर में कभी भगवान नहीं होता।

            चहुँ दिशाओं में फैली है माँ की  माया,
             सबको लगती है प्यारी माँ की छाया।
             है जन्मा इस पृथ्वी पर कौन सपूत,
              जो माता का कर्ज चुका पाया।

जिस घर में माँ का सम्मान नहीं होता,
उस घर में कभी भगवान नहीं होता।

               माता जननी है, माता पालक है,
             माता घोर निराशा में झिलमिल आशा है।
           देह की हर साँस है माँ की थाती,
             क्योंकि हमको माँ ही धरती पर लाती।

जिस घर में माँ का सम्मान नहीं होता,
उस घर में कभी भगवान नहीं होता।

             नहीं यहाँ कुछ असम्भव रह जाता,
             माँ के आशीर्वचन से  सब सम्भव हो जाता।
             माँ की ममता का कोई मोल नहीं होता,
             किसी सम्पदा से इसका तोल नहीं होता।

जिस घर में माँ का सम्मान नहीं होता,
उस घर में कभी भगवान नहीं होता।

               कैसा कुसमय आज है आया,
               हो रहा माँ का तिरस्कार यहाँ।
              जिस जननी ने दूध पिलाया है,
              कर दिया आज उसी को पराया है।

जिस घर में माँ का सम्मान नहीं होता,
उस घर में कभी भगवान नहीं होता।

रचयिता
डॉ0 रचना सिंह, 
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कटरी पीपरखेड़ा,
विकास खण्ड-सिकन्दरपुर कर्ण, 
जनपद-उन्नाव।

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