मेरी अभिलाषा

समाज की उन बुराइयों को,
जो खोखला बनाती हैं मानवीय मूल्यों को,
जड़ से उखाड़ फेंककर,
नई पौध का उपवन सजाया जाए,
यही मेरी अभिलाषा।
मसलकर कलियों का रस,
शहद पीकर जो हैं पले,
पहुँच गए जो अमीरी तक,
रौंदकर गरीबों को पैरों तले,
उन्हें खुदा का वास्ता दिया जाए,
यही मेरी अभिलाषा।
कोई सोता है भूखा,
तो कोई भूख को है रोता,
किसी को मखमल पर भी नींद नहीं आती,
तो कोई बिन बिस्तर के है सोता,
समाज के इस दर्दनाक मंजर को,
खुशहाली में तब्दील किया जाए,
यही मेरी अभिलाषा।

रचयिता
कुसुम भट्ट,
सहायक अध्यापक गणित,
राजकीय इंटर कॉलेज कण्डारा,
जनपद-रुद्रप्रयाग।

Comments

  1. ...........
    समाज के इस दर्दनाक मंज़र को
    खुशहाली में तब्दील किया जाय
    शिक्षा के असली उद्देश्य को दर्शाती पंक्तियाँ

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