प्रकृति की सीख

है आज धरा फिर हरी हुई
प्रकृति की गोद भी भरी हुई
अम्बर भी है कुछ साफ -साफ
नदियाँ भी जल से भरी हुई।

पर्वत देखो फिर अचल हुए
जंगल भी मानो मुखर हुए
पक्षी करते फिर मधुर गान
पशु भी अब तो निर्भीक हुए

फिर मानव क्यों है मौन आज
देना है कर्मों का हिसाब
सबकी धरती पर कब्जा क्यूँ
मन में अपने बस सोच आज

तू धैर्य न खो अपने मन से
कुछ वायु सुवासित बहने दे
फिर से होगा ये जग उजास
बस धुएँ को थोड़ा छंटने दे।

संकल्प उठा और रोक विनाश
फिर से संस्कृति का कर विकास
वसुधैव कुटुम्बकम का नारा दे
होगा तेरा यही पश्चाताप।

रचयिता
नीलम गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
मॉ. इ. मा. कम्पोजिट विद्यालय गोयना,
विकास खण्ड-हापुड़,
जनपद-हापुड़।

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