पुरवाई

निशा बीत गई भोर हुई अब
रश्मि फैलाई सूरज ने तब
चिड़िया चहकी नील गगन में
बहने लगी ठंडी पुरवाई

अब तक क्यों सोया है तू नर
अब तक क्यों सोई है नारी
बहने लगी ठंडी पुरवाई।।
डिस्को, पब में रात गुजारी
भोर हुई जब
कैसे उठे नर और नारी
बहने दो ठंडी पुरवाई।।
नियम धर्म सब तोड़ रहे थे
कुछ अपनों को छोड़ रहे थे
अपने लिये सब जोड़ रहे थे
अब व्याकुल है सब नर और नारी
बहने दो ठंडी पुरवाई।।
मिला दण्ड अब प्रकृति से जब
काम ना आया जोड़ा हुआ तब
अब घर में दुबके सब नर नारी
आओ मिलकर बैठे सब अब
बहने दे ठंडी पुरवाई।।

रचयिता
सविता शर्मा,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय गौतिया,
विकास खण्ड-कोटाबाग,
जनपद-नैनीताल,
उत्तराखण्ड।

Comments

  1. Bahut achi kavita likhi hai
    Sun kar achha lga
    Yaha par sabko sunai Maine

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