पथिक घबराना नहीं

पथिक घबराना नहीं ये पगडंडियाँ अंतहीन नहीं
बस चलते रहने का हौंसला रखो, मंजिल दूर नहीं

न व्यथित हो न निराश हो ना कदमों को रोको
गहन अंधकार भी हो तो स्वर्णिम सूरज निकलने में अब देर नहीं

ये चुनौतियाँ कुछ भी नहीं तुम्हारे अदम्य साहस और धैर्य के सामने
ये सैलाब भी गुजर जाएगा तुम्हारे सधे कदमों से
इन चुनौतियों को धुँधली यादें बनने में अब देर नहीं
भले ही तुम्हें आज इस अकेलेपन से शिकायत हो गई है पर इसी अकेलेपन से सबके दिलों में समाने में अब देर नहीं

इसलिए हे पथिक इन दुश्वारियों में अपनेआप को  तपाने से घबराना नहीं
हौंसला रखो चमकता सोना बनने में अब तुम्हें देर नहीं।।

रचयिता
अंजू चौबे,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय केराकतपुर,
विकास खण्ड-काशी विद्यापीठ,
वाराणसी।

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