मेरा गाँव
मुझे प्यारा लगता है अपना गाँव,
जहाँ मिलती प्यार की सुखद छाँव,
बचपन बीता शहर में मेरा,
उसकी नहीं है मुझे याद,
गाँव में बीते पल क्षण जो भी,
मन में चिर हैं याद।
कही भी आना कहीं भी जाना,
सब पूरा बेखौफ।
खेत मनुज डंगर हो जंगल
सब अपने कोई न पराया।
आँगन में लकड़ी, पत्थर से खेले,
याद बहुत वो पीपल की छाँव।
जहाँ मिल बैठ चराते हम गोऊ,
चंदन सी महकी वो मिट्टी।
नदिया की वो चंचल चाल,
याद बहुत आते हैं वो पल,
आज भी जिन्दा जीवन गाँव।।
रचयिता
आरती बहुगुणा,
प्रधानाध्यापिका,
रा0प्रा0वि0 मरगाँव,
संकुल-गोदा,
विकास खण्ड-थलीसैंण,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।
जहाँ मिलती प्यार की सुखद छाँव,
बचपन बीता शहर में मेरा,
उसकी नहीं है मुझे याद,
गाँव में बीते पल क्षण जो भी,
मन में चिर हैं याद।
कही भी आना कहीं भी जाना,
सब पूरा बेखौफ।
खेत मनुज डंगर हो जंगल
सब अपने कोई न पराया।
आँगन में लकड़ी, पत्थर से खेले,
याद बहुत वो पीपल की छाँव।
जहाँ मिल बैठ चराते हम गोऊ,
चंदन सी महकी वो मिट्टी।
नदिया की वो चंचल चाल,
याद बहुत आते हैं वो पल,
आज भी जिन्दा जीवन गाँव।।
रचयिता
आरती बहुगुणा,
प्रधानाध्यापिका,
रा0प्रा0वि0 मरगाँव,
संकुल-गोदा,
विकास खण्ड-थलीसैंण,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई
ReplyDeleteसुंदर कविता,व भावनाएं
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