पृथ्वी दिवस

धरती तुम क्यों चुप रहती हो,
कुछ तुम क्यों नहीं कहती हो।

निर्मल जल धाराओं को भी,
मल-कचरे से है भर डाला।
जलचर जिसमें पलते सारे,
घातक विष घुलता जाता।

निरीह जीव सब झेल रहे हैं,
मानव की शैतानी को।
प्राणी जन सब तरस रहे,
शुद्ध नीर को पाने को।

जंगल पर कब्जा है उसका,
नहीं टूटता जज्बा उसका।
मानव ने तुझको है लूटा,
बचा न कोई पत्ता बूटा।

मारुत में भी गरल घोलकर,
धरती तेरा ताप बढ़ाया।
दुष्परिणाम झेलता मानव,
फिर भी वो कुछ  समझ न पाया।

दावानल से झुलसी धरती,
मानवता पर व्यंग्य है कसती।
यही श्रेष्ठतम कृति थी जिस पर,
बहुत गर्व मैं करती थी।

रोग व्याधि सब उसने उपजे,
दोहन मेरी निधि का करके।
जल, जंगल, नभ के प्राणी,
होकर विवश जीवन को तरसें।

अब वह वृक्ष लगाएगा,
पृथ्वी दिवस मनाएगा,
और प्रकृति के शुद्धिकरण का,
झंडा वो फहराएगा।

तुम सक्षम हो स्वनिर्माण में,
तुम बता क्यों नहीं पाती हो?
मूर्ख बनाता है वह खुद को
नासमझी उसकी जारी है।

मानव की दखलंदाजी ही,
पूरी धरती पर भारी होगी
पुनः भूल पीड़ा धरती की,
दोहन उसका जारी होगा

एक दुष्ट संतान तुम्हारी,
बाकी का हक छीन रही।
लुप्त हो रहे प्राणी निर्दोष,
क्या उनको दोषी पाती हो?

धरती तुम तो सबकी माँ हो,
इतना कैसे सहती हो?

रचयिता
पूनम दानू पुंडीर,
सहायक अध्यापक,
रा०प्रा०वि० गुडम स्टेट,
संकुल-तलवाड़ी,
विकास खण्ड-थराली,
जनपद-चमोली, 
उत्तराखण्ड।


Comments

  1. शब्दों का अनोखा संकलन।सत्य कथन धरती कैसे सह रही ये क्रदंन यह विचार करे सभी मानव जन अन्यथा देना पड़ेगा हमें तन मन धन।।

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  2. बिल्कुल सही 🙏🙏🙏

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