पृथ्वी

पृथ्वी है प्रकृति का अनुपम वरदान,
हम सब हैं इसकी अनमोल संतान।
बिगड़ रहा है वसुंधरा का संतुलन,
फिर भी मानव बन रहा अनजान।

फूँक चिमनी डीजल पेट्रोल कोल खदान,
लिख रहा मानव खुद ही मौत का गान।
घुट रहा है दम, निकल रही है जान,
कोई सुन लो दे दो उसे जीवनदान।

काट वृक्ष हो रहा मृदा का अपरदन,
इंसान ही बन रहा पृथ्वी का दुश्मन।
जन बन रहे खुद की जान के दुश्मन,
विलुप्त हो रहे हैं धरा के संसाधन।

हे इंसान कर कुछ ऐसा कार्य महान,
हरी भरी हो वसुधा महके सारा गगन।
पृथ्वी है प्रकृति का अनुपम वरदान,
हम सब हैं इसकी अनमोल संतान।

रचयिता
नवनीत शुक्ल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय भैरवां द्वितीय,
शिक्षा क्षेत्र-हसवा,
जनपद-फतेहपुर।

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