नवरात्रि आयी थी

सिंह पर सवार माँ आयी थी
दुख दरिद्र विनाशन को
माँ आयी थी।
माँ भक्तों को  सुफल बाँटेगी।
माँ की कृपा दृष्टि  मिलेगी।

माँ की महिमा है अति न्यारी।
 माँ सबको है लगती प्यारी।
माँ दुर्गा है, माँ चण्डी है,
माँ के रूप निराले।
नव रुपों में माँ सजती है,
 नौ - 2 रुप निराले।
माँ दुर्गतिनाशिनी, काल विनाशिनी।
संकटहरणी, मंगल करणी,
माँ है दुख निवारणी।

तू ही कर्मा, तू ही धर्मा,
तू ही भाग्य विधाता माँ।
दुनिया तेरी महिमा गाये।
तू ही खेल खिलाती माँ।

तुम ब्रह्माणी, तुम रुद्राणी,
तुम ही कमला रानी माँ।
त्रिदेवों की शक्ति ही तुम हो,
तू ही योगिनी षोडशी माँ।

तुम ही जननी जग की माँ,
तू ही पालनहारी।
विश्व का कल्याण कर माँ
ऋद्धि सिद्धि दे कल्याणी।

तुम दुखियों की औषधि बनो माँ।
भूखों को निवाला दो माँ।
बच्चों  का दुलार बनो माँ।
ज्ञानार्थियों की ज्ञान बनो माँ।

समाज में संस्कार बनो माँ।
रिश्तों में तुम प्यार बनो माँ ।
सुहागन का श्रृंगार बनो माँ।
पुष्पों की बहार बनो माँ ।

रसोई में अन्नपूर्णा बनो माँ।
घर - 2 में आशीष दो माँ।
व्यापार में लाभ बनो माँ।
भक्तों की भगवान बनो माँ।

दुनिया को दर्श दिखाओ माँ।
नैतिकता का पाठ पढ़ाओ माँ।
माँ अमृत का प्याला लाकर
आयु आरोग्य प्रदान करो माँ।

अष्ट सिद्धियाँ नव निधियाँ दो माँ।
सबकी भाग्य विधाता बनो माँ।

रचयिता
माधव सिंह नेगी,
प्रधानाध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय जैली,
विकास खण्ड-जखौली,
जनपद-रुद्रप्रयाग,
उत्तराखण्ड।

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