प्राइमरी का मास्टर

'प्राइमरी का मास्टर' होना, कोई बच्चों का खेल नहीं,
हम जो कुछ कर लेते उसका, दुनिया भर में तोड़ नहीं।

हर चुनाव के प्रहरी हैं हम, जनगणना का कोई मोल नहीं,
हर ख़ुराक आइरन दिलवाएँ, इससे कोई अबोध नहीं।
घर-घर से ख़ुद बच्चे पकड़े, यहाँ एडमीशन की होड़ नहीं।
हम जो कुछ कर लेते उसका, दुनिया भर में तोड़ नहीं।

कपड़ा, बस्ता, जूता बाँटें, MDM का कोई जोड़ नहीं,
सब्जी, सिलेण्डर, दूध पहुँचाएँ, यहाँ परिचायक का रोल नहीं।
इन सब में असुविधा हो, फिर भी बच्चों पर रोष नहीं,
हम जो कुछ कर लेते उसका, दुनिया भर में तोड़ नहीं।

शारदा, निष्ठा सब थीं फिर भी, वो प्रेरणा जैसी बेजोड़ नहीं,
हर सख्ती हम सह लेते पर, ख़ुद पर कोई खरोंच नहीं।
इतने पर भी नवाचारी हैं, ये महज़ एक संयोग नहीं,
हम जो कुछ कर लेते उसका, दुनिया भर में तोड़ नहीं।

'प्राइमरी का मास्टर' होना, कोई बच्चों का खेल नहीं ,
हम जो कुछ कर लेते उसका, दुनिया भर में तोड़ नहीं ।

रचयिता
दीक्षा मिश्रा,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय असनी द्वितीय,
विकास खण्ड-भिटौरा,
जनपद-फतेहपुर।

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