वर्धमान महावीर

      हमारे देश भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी लोग अपना- अपना धर्म पूरी निष्ठा एवं आस्था के साथ मनाते हैं। उन्हीं धर्मों में से एक धर्म जैन धर्म है।
      जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी जी हैं। जिनके द्वारा दी गयी शिक्षाओं की आवश्यकता आज सम्पूर्ण विश्व को है।
      आज के दिन सभी जैन धर्मावलंबी  भगवान महावीर स्वामी जी का जन्मदिन मना रहे हैं।
      महावीर स्वामी जी का जन्म चैत्र शुक्ल पक्ष त्रयोदशी को वैशाली के निकट कुण्ड ग्राम में  540  ई०पू० में हुआ था। इनके पिता तथा माता का नाम क्रमशः सिद्धार्थ एवं त्रिशला था। इनकी पत्नी का नाम यशोदा तथा महावीर का वास्तविक नाम वर्द्धमान था।
       आगे चलकर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर कहलाये।
     30 वर्ष की आयु में ग्रह त्याग कर बारह वर्ष की तपस्या करने के बाद 42 वर्ष की आयु में महावीर जुम्भिग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।
ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद महावीर स्वामी को कैवलिन, जिन 
(विजेता) कहा गया है।
      महावीर स्वामी की मृत्यु 72 वर्ष की आयु में 568 ई०पू० बिहार राज्य के पावापुरी नामक स्थान पर हुई थी।
    महावीर स्वामी को अहिंसा का पुजारी कहा जाता है। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था।
         समय-समय पर महापुरुषों ने भारत की धरती पर जन्म लेकर जैन धर्म का प्रचार किया है। आज विश्व को महावीर स्वामी की शिक्षाओं की आवश्यकता है। महावीर स्वामी जी ने तीन साधनों के अनुकरण का उपदेश दिया है।
जिन्हें त्रिरत्न कहते हैं।
सम्यक् ज्ञान - सच्चा और सम्पूर्ण ज्ञान, जो तीर्थंकरों के उपदेश से प्राप्त होता है।
सम्यक् दर्शन -  तीर्थंकरों में पूरी श्रद्धा और अखण्ड विश्वास।
सम्यक् चरित्र  -  सदाचार पूर्ण जीवन व्यतीत करना। अपनी इन्द्रियों और कर्मों पर नियंत्रण।
महावीर के पंच महाव्रत -  चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी जी ने पाँचवाँ महाव्रत  ब्रम्हचर्य को जोड़ा   -
अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रम्हचर्य आदि।
  वर्तमान समय में महावीर स्वामी की शिक्षायें आज भी प्रासंगिक हैं जिन्हें हम इस प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं।
    वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व वैश्विक महामारी का शिकार है जिसके जिम्मेदार हम सब हैं। चारों तरफ अराजकता भरी पड़ी है, जहाँ दुनिया आतंकवाद, उग्रवाद और गृह युद्ध जैसे कई रूपों में हिंसात्मक लड़ाई लड़ रही है। यदि हम सभी हिंसा का मार्ग त्याग कर अहिंसा को अपनाएँ तो विश्व शांति की स्थापना करने में समर्थ हो जाएँगे।
   विकास की अंधी दौड़ में और भौतिक संसाधनों की अधिक लोलुपता के कारण प्रकृति के संतुलन को खुद खत्म कर दिया है।
   प्रकृति के प्रचुर संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को रोकना चाहिए। महावीर स्वामी जी की शिक्षा के अनुसार आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को नहीं रखना चाहिए और प्रकृति प्रेम पर विश्वास करना चाहिए।
     पेड़-पौधों, जल अग्नि, वायु, पृथ्वी सभी में जीवन है अतः व्यर्थ में हिंसा नहीं करनी चाहिए।
           प्रत्येक प्राणी की आत्मा में ईश्वर का निवास होता है इसलिए सभी को  अपने समान समझो।
    इस प्रकार वर्तमान समय में महावीर स्वामी जी की शिक्षा को अपना कर सम्पूर्ण विश्व में शांति एवं वसुधैव कुटुंब की भावना को  स्थापित किया जा सकता है।
   
लेखक
प्रतिमा उमराव,
सहायक शिक्षिका,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय अमौली,
विकास खण्ड-अमौली,
जनपद-फतेहपुर।

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