पृथ्वी माता की पुकार

ओ प्राणी तेरे कर्मों से,
दुखी हुई धरती माता।
बहुत हुआ तेरे पापों का,
भार ना इससे सहा जाता।।

समझ जरा इसकी बैचेनी,
क्यों भारी अधर्म कमाता है।
दिया अन्न भन्डार है घर में
परिवार सहित तू खाता है।।

पेड़ पौधों को काट के तूने,
बंजर इसको बना दिया।
जरा ना सोचा विचारा अधर्मी,
क्यों ऐसा अत्याचार किया।।

कूडा, करकट, प्लास्टिक थैली,
फेंक के मत कर अब गन्दा।
वरना एक दिन पड़ेगा तुझमें
तेरी सारी करनी का डंडा।।

वैसे तो लोगों ने सदियों से,
माँ कह इसे संबोधित किया।
दिया बहुत कुछ इस माँ ने,
पर बदले में क्या इसे दिया।।

जीना है खुशमय जीवन,
तो वृक्ष लगाने हैं सबको।
हरी भरी जब महक उठे,
तब खुशी मिले है नभ को।।

ओ पापी इन्सान सुधर जा,
कीमती वक्त अभी भी पास।
स्वच्छ रखेगा स्वस्थ्य रहेगा,
पृथ्वी माँ को है ये आस।।

रचयिता
मन्जू शर्मा,
सहायक अध्यापिका, 
प्राथमिक विद्यालय नगला जगराम,
विकास खण्ड-सादाबाद,
जनपद-हाथरस।

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