व्यथित मन की कलम

ऐ मन! ले चल मुझे उस देश में।
अरे चल न मेरी कल्पना के वेश में।।

1) न कोप न कोई क्रन्दन हो
न अट्टहास कोई न रुन्दन हो
न मिले कोई बाधा रूप के क्लेश में।
ले चल मुझे उस देश में।।

2) न कोई आपदा न कोई गर्जन हो
न हो चीत्कार न ही कोई तर्जन हो
सबमें भाईचारा हो ऐसे देश में।
ले चल मुझे उस देश में।।

3) न अपराध हो न लिप्त जात-पात में
न बैर की बू भी दिखे किसी बात में
क्षमा, दया भावना चढ़े रूपी बेल में।
ले चल मुझे उस देश में।।

4) न काँटों की राह हो न प्रेम की थाह हो
आशारूपी किरण की हर तरफ बस चाह हो
शिक्षा, सहयोग, प्रार्थना रहे न बस जेल में।
ले चल मुझे उस देश में।।

रचयिता
आयुषी अग्रवाल,
सहायक अध्यापक,
कम्पोजिट विद्यालय शेखूपुर खास,
विकास खण्ड-कुन्दरकी,
जनपद-मुरादाबाद।

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