झंझावत

हृदय के बन्द कपाटों में
झंझावत कुछ ऐसा आया
जो कुछ था दृष्टि से दूर
उसको अपने निकट पाया।
जिसका कल्पित रूप कभी
धुंधला-धुंधला सा लगता था
पल में ही वो स्पष्ट सा
मन्द-मन्द सा दिखने लगा।
वाणी जो मृदुल लगती थी
वो वाणी भी अब मौन हुई
धुंधली सी हुई दिशाएँ सब
सन्नाटे सा कुहरा उमड़ने लगा।
आडिग था संकल्प मेरा
अपने अपूर्ण उद्देश्यों पर
डगमगा सा गया कुछ पल में
समय के ....
प्रचण्डित झंझावत से!!
शनैः-शनैः समाप्त हुआ
हर विकल्प ...
जो मन में बैठा था!
एक विकसित रूप लेकर
समय का झंझावत आया
उड़ा ले गया अपने साथ
सारी सृजित कल्पनाएँ
मन्द-मन्द सी पड़ने लगी
अभिलाषाओं की तीव्र ध्वनि!
स्मृतियाँ! अब विस्मृत हुईं
सिमट के रह गए चक्षु स्वप्न
आवेगित सा उथल पुथल जीवन
अशांत, क्रोधित, कम्पित!!
आभास लिए ...
शब्द विलीन किये बैठा हृदय
कहने को अब शब्द कहाँ!!
जो जीवन रूपी तरु खड़े
वो उखड़ पड़े झंझावत से
वो गर्म हवा का झंझावत
करुणा जिसमें पिघल पड़ी
झंझावत! ये ऐसा झंझावत ....!!
जो साथ उड़ा ले गयी......
     मेरी वेदना सारी......! ।।

रचयिता
दीप्ति राय,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय रायगंज, 
विकास खण्ड-खोराबार,
जनपद-गोरखपुर।

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