धरम पताका

धरम  पताका  ज्ञान  की, फहर करै विस्तार।
जहर  भरे  मन  ते  भयौ, जग पै घात कुठार।

रक्तबीज  सौ  है असुर, बढ़त गुणित अनुपात,
रखि जीवन की कामना, विकल भयौ संसार।

जहाँ  बने  ठहरौ  वहीं,  समझ  तगादौ  काल,
विचरि  गयौ  या  देस  में, सँभर न  पावै यार।

खाँसी हो बलगम बिना, साँस सकै  नहि  रोक,
हल्के  में  समझौ  नहीं,  छींकत  तेज   बुखार।

विपदा  में  धीरज  धरौ,  मनहि  भरोसौ  राखि,
दूजे   ते   दूरी   रखौ,   मन   में   प्यार  अपार।

दुर्गा   दुर्गतिनाशिनी,   रोकौ    जग कौ    नाश,
हे!   महिषासुर  मर्दिनी,   लेउ   सुरक्षा   भार।

सबकी सुधि बुधि राखि कै, करौ जगत कल्याण,
"वेद"   करै  करतार   ते,   विनती   बारम्बार।
                           
रचयिता
विपिन गुप्त 'वेद',
विज्ञान पार्ट टाइम टीचर,
कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय छाता, 
विकास खण्ड-छाता,
जनपद-मथुरा।

Comments

  1. बहुत सुंदर रचना

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    1. सादर आभार आदरणीया

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