भावनाएँ

अबोध बालक के मोहक मुखमण्डल पर,
 चुंबकीय आकर्षण उत्पन्न करती हैं।
जननी के स्पर्श मात्र मे,
अलौकिक ममता का रस भरती हैं।

पिता के कठोर वचनों को भी,
कल्याणकारी व सार्थक बनाती हैं।
सात फेरों से.. सात जन्मों तक,
साथ निभाने का प्रण कराती हैं।

मित्र के एक मुट्ठी चावल में भी,
छप्पन भोग का आनंद जगाती हैं।
गुरु से आशीर्वाद प्राप्ति में जो,
मोक्ष प्राप्ति की अनुभूति कराती हैं।

एक दूजे के कष्टों का आभास कर,
मानव सेवा की चेतना जगाती हैं।
ये भावनाएँ निसंदेह अत्यंत अनमोल हैं,
जो एक मानव को.. मानव बनाती हैं।

रचयिता
दीप्ति खुराना,
सहायक अध्यापक, 
जूनियर कम्पोजिट विद्यालय पंडिया,
विकास खण्ड-कुन्दरकी, 
जनपद-मुरादाबाद।

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