10/2026, बाल कहानी- 29 जनवरी
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 10/2026
*29 जनवरी 2026 (गुरुवार)*
#बाल_कहानी - #भोला_रामू
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सुबह का समय था अनंतपुरम के विद्यालय में प्रार्थना के स्वर गूँज रहे थे। प्रार्थना के उपरान्त राष्ट्रगान हुआ और सभा विसर्जन के साथ विद्यालय नन्ही पदचापों और कलरव ध्वनि के साथ गुंजायमानहो उठा। शिक्षकों के कक्षा में प्रवेश के साथ कक्षाएँ किंचित अनुशासित हो उठी। शिक्षक पढ़ाने में व्यस्त हो गए और बच्चे पढ़ने में। कुछ शिक्षक जिनके पास छोटा बच्चा था, ने कक्षा-कक्ष में अपना डेरा जमा लिया। भोले बच्चे स्वयं से छोटे बच्चे की बाल सुलभ क्रीड़ाओं से आनन्दित होने लगे। शिक्षिका विदिशा ने बच्चों को पढ़ाना आरम्भ किया। पर बालक का रोना अध्ययन-अध्यापन में विघ्न डालने लगा। कक्षा में रामू बड़े ध्यान से यह सब देख रहा था। रामू बहुत कुशाग्र बुद्धि का था। उसकी ग्रहण क्षमता बहुत तीव्र थी। शिक्षिका की अनुभवी आँखों से यह सब छिपा न था। उन्होंने आव देखा न ताव, बालक को रामू को सौंप दिया और हिदायत दी कि, "वह उसे घुमा कर ले आये।" घूमने के नाम पर बच्चे का रोना बन्द हो गया। शिक्षिका ने भी चैन की साँस ली। धीरे-धीरे रामू स्कूल तो आता, पर उसका कार्य व उत्तरदायित्व शिक्षिका के बच्चे की ओर अधिक हो गया। कभी वह उसे घुमाता, कभी जूते पहनाता, कभी-कभी वह उसे बाहर से सामान खरीद कर देता और उसके खाने में उसकी सहायता करता। यह सब करके भोला रामू बहुत खुश रहता। उसे लगता कि वह टीचर को सबसे ज्यादा प्रिय है व उनका लाडला है। राजू और मुनिया भी उसी स्कूल में उसकी सीनियर क्लास में थे। चंचल राजू का ध्यान तो अपने खेलने और पढ़ने में था, पर मुनिया का ध्यान रामू की तरफ भी था। रामू का घर चूँकि मुनिया और राजू के घर के पास ही था इसलिए विद्यालय आते-जाते। रामू से मुनिया की बातचीत हो ही जाती।
बातों ही बातों में एक दिन मुनिया ने रामू से पूछा कि, "आज स्कूल में क्या पढ़ाई हुई?" रामू हक्का-बक्का मुनिया की ओर ताकने लगा। मुनिया ने देखा कि रामू अपनी पढ़ाई के बारे में कुछ भी नहीं बता पा रहा है।
बात आई-गई हो गई। दूसरे दिन घर लौटते समय मुनिया ने रामू से कहा कि, "लाओ, तुम्हारी उत्तर पुस्तिका देखें। तुम्हारा हस्त लेखन तो बहुत सुन्दर है।" पर कॉपी खुलते ही मुनिया अवाक रह गई। कॉपी के एक-दो पृष्ठ ही भरे थे जबकि विद्यालय खुले तीन-चार महीने हो गए थे। दृढ़ मुनिया दूसरे ही दिन शिक्षिका विदिशा के पास गयी। उसने दूर से ही देखा कि रामू बालक को जूते पहनाने में मस्त था। मुनिया ने दृढ़ स्वर में कहा, "मैडम! क्या आपने रामू की कॉपियाँ नहीं देखी? उसने पिछले दिनों कुछ भी नहीं लिखा है जबकि दूसरे बच्चों ने कॉपी में बहुत सारा कक्षा-कार्य व गृह-कार्य किया हुआ है।" विदिशा ने आग्नेय दृष्टि से मुनिया को देखा व डाँटकर भगा दिया। उस दिन मुनिया जब घर लौटी तो रात में उसने दादी से इस बात का जिक्र किया तो दादी थोड़ी देर सोचती रही, फिर उनके चेहरे पर चमक आ गई, जैसे उन्हें समस्या का हल मिल गया हो। पेरेंट्स मीट के दिन दादी ने विदिशा मैडम से कहा कि, "मैडम! आपका बड़ा बच्चा जिस स्कूल में पढ़ता है, वहाँ की टीचर उससे अपने बच्चे का काम कराती है। मेरा बच्चा वहाँ पढ़ने जाता है न कि उनके बच्चे का काम करने।" विदिशा मैडम ने भड़क कर कहा, "पर यही काम तो आप रामू के साथ कर रही हैं और वह भोला बालक यह समझ रहा है कि आपसे बड़ा उसका कोई शुभ-चिन्तक नहीं है।" मैडम ने रामू की ओर देखा। रामू उनके बच्चे को गाना गाकर खाना खिला रहा था। उन्होंने अपने बच्चे को गोद में लेकर रामू को गले लगा लिया। उनकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
#संस्कार_सन्देश -
जीवन की किसी भी भूमिका में हमे अपने दायित्व बोध से विचलित नहीं होना चाहिए।
कहानीकार-
डॉ #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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